राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिख रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा लगातार मानेसर प्रकरण का जिक्र किए जाने से कांग्रेस के भीतर असहजता बढ़ती नजर आ रही है। सवाल यह उठने लगा है कि क्या यह बयानबाजी पार्टी की एकजुटता को मजबूत कर रही है या फिर अनजाने में ही संगठन को कमजोर कर रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी दल का मूल उद्देश्य संगठन का विस्तार, सत्ता में भागीदारी और विपक्ष में रहते हुए सरकार की जवाबदेही तय करना होता है। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम में कांग्रेस इन मूल उद्देश्यों से भटकती हुई दिखाई दे रही है।
गहलोत द्वारा बार-बार मानेसर प्रकरण को उठाने से न सिर्फ पुराने विवाद ताजा हो रहे हैं, बल्कि इससे पार्टी के अंदर गुटबाजी की चर्चा भी तेज हो गई है। खास बात यह है कि जिन मुद्दों जैसे 25 सितंबर की घटना, अजय माकन के साथ कथित व्यवहार और आलाकमान की अनदेखी का जिक्र किया जा रहा है, उन पर सचिन पायलट की ओर से सार्वजनिक बयानबाजी कम ही देखने को मिलती है।
यही वजह है कि भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का अवसर मिल जाता है। एक ओर गहलोत भाजपा पर आरोप लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा मानेसर प्रकरण को सामने रखकर कांग्रेस की आंतरिक कलह को उजागर करने की कोशिश करती है।
सबसे अहम सवाल संगठनात्मक स्तर पर उठता है। आखिर क्यों कांग्रेस के केंद्रीय पदाधिकारी अपने ही नेताओं को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बयान देने से पहले संयम बरतने की सलाह देने में असहज दिखते हैं? क्या यह स्थिति इसलिए है क्योंकि पार्टी आलाकमान स्वयं 25 सितंबर की घटना को अब तक भुला नहीं पाया है?