गहलोत ने अपने पत्र में दावा किया कि राजस्थान देश के उन राज्यों में शामिल हो गया है, जहां मजदूरी दरें सबसे कम हैं। उन्होंने श्रम विभाग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि मार्च 2026 तक राज्य इस मामले में निचले स्तर पर बना हुआ है, जो बेहद चिंताजनक है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में राजस्थान में अकुशल श्रमिकों को मात्र 7,410 रुपए प्रति माह और अत्यधिक कुशल श्रमिकों को 9,334 रुपए प्रति माह न्यूनतम मजदूरी मिल रही है। गहलोत के अनुसार, पिछले एक दशक में मजदूरी दरों में केवल 40-50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि इसी अवधि में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) लगभग दोगुना हो गया। इसका सीधा असर श्रमिकों की क्रय शक्ति पर पड़ा है, जो वास्तविक रूप से केवल 20-30 प्रतिशत ही बढ़ पाई है।
दूसरे राज्यों से तुलना में पिछड़ा राजस्थान
गहलोत ने अपने पत्र में केरल, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन राज्यों में मजदूरी दरों में 80 से 110 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, जबकि राजस्थान इस मामले में काफी पीछे रह गया है। उन्होंने इसे नीतिगत कमी का परिणाम बताया।
नीतिगत बदलावों की जरूरत पर जोर
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में परिवर्तनीय महंगाई भत्ता (VDA) का संशोधन अनियमित है, जबकि इसे CPI से जोड़ा गया है। नियमित और समयबद्ध संशोधन नहीं होने के कारण श्रमिकों को महंगाई का पूरा बोझ उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी मुद्दा उठाया कि राज्य सरकार सभी असूचीबद्ध रोजगारों के लिए एक समान मजदूरी दर तय करती है, जबकि कृषि, निर्माण, घरेलू कार्य और ईंट भट्टा जैसे क्षेत्रों की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। ऐसे में क्षेत्र-विशिष्ट मजदूरी दरें तय की जानी चाहिए।
मजदूरी में क्या बदलाव चाहते हैं गहलोत?
गहलोत ने सुझाव दिया कि न्यूनतम मजदूरी को तत्काल प्रभाव से 12,000 से 15,000 रुपए प्रति माह के बीच संशोधित किया जाए, ताकि यह वर्तमान महंगाई और जीवन-यापन की लागत के अनुरूप हो सके।
इसके साथ ही उन्होंने VDA संशोधन को हर 6 महीने में अनिवार्य करने, और मजदूरी निर्धारण में परिवहन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे खर्चों को शामिल करने की मांग भी की
