शिव क्षेत्र का एक स्कूल इन दिनों पत्रकारों और आमजन के बीच राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया है। आज बायतु विधायक हरीश चौधरी ने एक राज्यसभा सांसद की सांसद निधि से छह लाख रुपये की घोषणा करवाई है, जबकि इससे पहले वे अपनी विधायक निधि से भी छह लाख रुपये दे चुके हैं।
इस पर शिव विधायक रवींद्र सिंह भाटी ने हरीश चौधरी के क्षेत्र की कुछ भवन-रहित स्कूलों का जिक्र करते हुए कहा था कि विधायक निधि के नियमों के तहत वे वहां फंड नहीं दे सकते। हरीश चौधरी ने इसका सीधा जवाब देने के बजाय इस बार अपने काम के माध्यम से प्रतिउत्तर दिया कि दूसरे राज्य के राज्यसभा सदस्य से भी फंड उपलब्ध कराया जा सकता है।
दरअसल, इस मुद्दे पर बहस का केंद्र स्कूलों की बदहाल स्थिति होनी चाहिए थी, ताकि सरकार, जनप्रतिनिधियों और प्रशासन पर सुधार का दबाव बने। लेकिन इसके बजाय लोग दो नेताओं की राजनीतिक टकराहट को ही सोशल मीडिया पर उछालने में लगे हैं।
क्या हर कार्य केवल वोट बैंक को देखकर ही होना चाहिए? क्या इस मुद्दे को हरीश चौधरी बनाम रवींद्र सिंह भाटी के बजाय हमारे बदहाल वर्तमान और बेहतर भविष्य के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए? चुनाव तो हर पांच साल में आते ही हैं और तब आरोप-प्रत्यारोप भी होने चाहिए, ताकि जनता सही प्रतिनिधि चुन सके। पर हर मुद्दे को राजनीति में बदल देना भी उचित नहीं है।
बिना भवन के पढ़ने वाले ये बच्चे किस क्षेत्र या किस निधि से जुड़े हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि यदि समय रहते इनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो हम अनेक संभावनाओं से भरी प्रतिभाओं के साथ अन्याय करेंगे। यह सभी जनप्रतिनिधियों की साझा जिम्मेदारी है कि वे राजनीति से ऊपर उठकर लोकनीति और विकास के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करें।