अब सवाल उठ रहा है कि क्या अलग-अलग राज्यों में राज्यपालों का रवैया अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से बदल रहा है? या फिर संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर दो अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं।
तमिलनाडु में क्या है पूरा मामला?
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में TVK ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा किया है। सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी है। TVK को कांग्रेस के 5 विधायकों का समर्थन प्राप्त होने की बात कही जा रही है, लेकिन इसके बावजूद बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए पार्टी को अन्य विधायकों का समर्थन जुटाना होगा।
राज्यपाल ने TVK नेतृत्व से सरकार गठन के लिए आवश्यक विधायकों के समर्थन का लिखित प्रमाण मांगा है। इसी बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। दूसरी ओर, एक प्रमुख दल ने अपने 47 में से 28 विधायकों को पुडुचेरी भेज दिया है, ताकि संभावित टूट-फूट या दबाव की राजनीति से बचा जा सके।
सूत्रों के अनुसार राज्यपाल तब तक सरकार गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, जब तक स्पष्ट संख्या उनके सामने पेश नहीं की जाती।
महाराष्ट्र का उदाहरण क्यों हो रहा वायरल?
तमिलनाडु के मौजूदा घटनाक्रम की तुलना अब महाराष्ट्र की राजनीति से की जा रही है। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा पूर्ण बहुमत से दूर थी, लेकिन राजनीतिक समीकरणों के बीच राज्यपाल ने बेहद तेजी से सरकार गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी।
उस समय भाजपा नेता को सुबह-सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि बिना पर्याप्त पारदर्शिता और स्पष्ट बहुमत साबित हुए सरकार बनाने का मौका दिया गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश दिए गए थे।
अब तमिलनाडु में राज्यपाल द्वारा लिखित समर्थन पत्र की मांग किए जाने पर विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि यदि महाराष्ट्र में तत्काल शपथ दिलाई जा सकती थी तो यहां इतनी सख्ती क्यों दिखाई जा रही है।
संवैधानिक प्रक्रिया क्या कहती है?
संविधान में सरकार गठन को लेकर राज्यपाल को कुछ विवेकाधिकार प्राप्त हैं। आमतौर पर राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता देते हैं और बहुमत साबित करने के लिए समय निर्धारित करते हैं।
हालांकि, जब स्पष्ट बहुमत नहीं होता तो राज्यपाल का निर्णय विवाद का विषय बन जाता है। कई बार समर्थन पत्र, गठबंधन समझौते और विधायकों की संख्या के आधार पर फैसला लिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि अंतिम बहुमत परीक्षण विधानसभा के पटल पर होना चाहिए।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
तमिलनाडु में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर भाजपा समर्थक दलों का कहना है कि राज्यपाल केवल संवैधानिक प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं और बिना स्पष्ट समर्थन के सरकार गठन का निमंत्रण देना उचित नहीं होगा।
सोशल मीडिया पर भी महाराष्ट्र और तमिलनाडु के घटनाक्रम की तुलना करते हुए “डबल स्टैंडर्ड” की बहस तेज हो गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यपाल की भूमिका को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं और यह मामला एक बार फिर उसी बहस को सामने ले आया है।
