पंचायत चुनाव में 'खर्च का खेल' खत्म: छिपाने वालों पर 3 साल की सजा, अब बैलगाड़ी से भी प्रचार पर रोक!

राजस्थान में मार्च-अप्रैल 2026 में प्रस्तावित पंचायती राज चुनावों (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद) में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग सख्त कदम उठा रहा है। 2020 के चुनाव में खर्च का ब्योरा (expenditure details) 15 दिनों के भीतर जमा न करने वाले हजारों उम्मीदवारों (पंच, सरपंच, सदस्य आदि) पर 3 साल तक चुनाव लड़ने की पाबंदी लग सकती है।

Jan 17, 2026 - 12:04
पंचायत चुनाव में 'खर्च का खेल' खत्म: छिपाने वालों पर 3 साल की सजा, अब बैलगाड़ी से भी प्रचार पर रोक!

जयपुर, 17 जनवरी 2026: राजस्थान के पंचायती राज चुनावों में इस बार 'पैसे का हिसाब' सख्ती से मांगा जाएगा। पिछले चुनाव में खर्च का ब्योरा छिपाने वाले हजारों पंच-सरपंचों को झटका लग सकता है। राज्य चुनाव आयोग ऐसे 'डिफॉल्टर्स' की लिस्ट तैयार करवा रहा है और उन्हें 3 साल तक चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। मार्च-अप्रैल में होने वाले इन चुनावों में खर्च सीमा दोगुनी कर दी गई है, लेकिन प्रचार के लिए तांगा या बैलगाड़ी जैसी 'देसी गाड़ियां' इस्तेमाल करने पर भी पाबंदी लगा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, 15 अप्रैल तक चुनाव कराने हैं, और 14 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों में एक साथ मतदान होगा। आइए, जानते हैं पूरी कहानी...

पिछले चुनाव के 'गुनहगारों' पर नजर: जिला कलेक्टरों को मिलेंगे सख्त निर्देश

राज्य चुनाव आयोग जल्द ही सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश जारी करने वाला है। उद्देश्य? 2020 के पंचायत चुनावों में खर्च का विवरण न जमा करने वाले उम्मीदवारों की सूची तैयार करना। उस चुनाव में 21 जिलों की 636 जिला परिषद सीटों और 4,371 पंचायत समिति सीटों के लिए वोटिंग हुई थी। कुल 12,663 पंचायत समिति और 1,778 जिला परिषद उम्मीदवारों ने मैदान में उतरे थे। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, हजारों उम्मीदवारों ने चुनाव नतीजे आने के 15 दिनों के भीतर अपना खर्च ब्योरा नहीं दिया।

आयोग के नियम साफ हैं: सरपंच, पंच, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य या जिला परिषद सदस्य—हर उम्मीदवार को नामांकन से लेकर नतीजे तक के खर्च का विस्तृत हिसाब देना अनिवार्य है। इसमें बिल और वाउचर भी जमा करने पड़ते हैं। अगर ऐसा नहीं किया, तो आयोग 3 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा सकता है। राज्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह ने स्पष्ट कहा, "यह प्रावधान है और हम जल्द आदेश जारी करेंगे। जिला निर्वाचन अधिकारियों से विवरण मंगवाया जाएगा।" जिला कलेक्टरों को लिस्ट बनाकर आयोग को भेजनी होगी, जिसके बाद कार्रवाई तय होगी। यह कदम चुनावों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए उठाया जा रहा है, ताकि 'काला धन' या अनुचित खर्च पर लगाम लगे। 

खर्च सीमा दोगुनी: अब सरपंच 1 लाख तक खर्च कर सकेंगे, लेकिन हिसाब चोखा रखना होगा

चुनावी मैदान में उतरने वालों के लिए अच्छी खबर भी है। 23 दिसंबर 2025 को आयोग ने खर्च सीमा बढ़ाने की अधिसूचना जारी की। पहले सरपंच सिर्फ 50 हजार रुपये खर्च कर सकते थे, लेकिन अब यह सीमा 1 लाख हो गई है। पंचायत समिति सदस्यों के लिए 75 हजार से बढ़कर 1.5 लाख, और जिला परिषद सदस्यों के लिए 1.5 लाख से 3 लाख रुपये कर दी गई है। यानी तीनों पदों पर खर्च दोगुना!आयोग का तर्क? ग्रामीण इलाकों में अब चुनाव प्रचार बदला है। सभाएं, यात्राएं, डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बढ़ा है। पुरानी सीमा से उम्मीदवारों को परेशानी हो रही थी। आयुक्त राजेश्वर सिंह बोले, "हम पारदर्शिता चाहते हैं। जनप्रतिनिधियों की मांग पर सीमा बढ़ाई गई है, ताकि वे वैध दायरे में रहकर प्रचार कर सकें।" लेकिन सावधान! नतीजे के 15 दिनों में पूरा ब्योरा जमा करना होगा, वरना 3 साल की पाबंदी का खतरा।

प्रचार में 'देसी स्टाइल' पर ब्रेक: बैलगाड़ी, तांगा या ट्रक इस्तेमाल न करें, वरना कार्रवाई

चुनाव प्रचार को और सख्त बनाते हुए आयोग ने वाहनों पर नई पाबंदियां लगाई हैं। बड़े वाहन जैसे बस, ट्रक, मिनी बस या मेटाडोर का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित है। इतना ही नहीं, पशुओं से चलने वाली गाड़ियां—जैसे तांगा, ऊंटगाड़ी या बैलगाड़ी—भी प्रचार में नहीं चलेंगी। आयोग का कहना है कि ये पाबंदियां चुनावी खर्च को नियंत्रित रखने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हैं। अगर कोई उल्लंघन करता पकड़ा गया, तो जिला निर्वाचन अधिकारी को सूचना देकर कार्रवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन: 15 अप्रैल तक चुनाव जरूरी, 14 हजार पंचायतों में एक साथ वोटिंग

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त फरमान दिया है—15 अप्रैल 2026 तक सभी पंचायत चुनाव कराएं। यह आदेश हाल ही में एक याचिका पर आया, जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट के 14 नवंबर 2025 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने परिसीमन प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए 31 दिसंबर तक इसे पूरा करने और अप्रैल तक चुनाव कराने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन डेडलाइन बरकरार रखी।

प्रदेश में 14 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों के चुनाव एक साथ होंगे, क्योंकि सभी का कार्यकाल पूरा हो चुका है। हालांकि, 12 जिलों की पंचायत समितियों और जिला परिषदों का कार्यकाल बाकी है। अगर 'वन स्टेट वन इलेक्शन' की नीति अपनाई गई, तो इनमें बोर्ड भंग करने पड़ सकते हैं। आयोग के नियमों के मुताबिक, एक बूथ पर 1,100 से ज्यादा वोटर नहीं होंगे। एक वार्ड में औसतन 300-400 वोटर होते हैं, इसलिए कई वार्डों को एक बूथ पर जोड़ा जाएगा।

चुनावों में पारदर्शिता का नया दौर: क्या होगा असर?

यह बदलाव राजस्थान के ग्रामीण राजनीति में बड़ा असर डाल सकते हैं। पिछले चुनावों के 'डिफॉल्टर्स' बाहर हो सकते हैं, जिससे नए चेहरे मैदान में आएंगे। खर्च सीमा बढ़ने से प्रचार आसान होगा, लेकिन हिसाब-किताब की सख्ती से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। जानकारों का मानना है कि यह कदम लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा, लेकिन ग्रामीण इलाकों में जागरूकता फैलानी होगी। क्या आपका इलाका भी प्रभावित होगा? चुनाव आयोग की अगली घोषणा पर नजर रखें!