रेगिस्तान की गूंज और मेवात की तान राजस्थान के इन 2 'लोक-कलाकरों को मिलेगा पद्म श्री सम्मान

भरतपुर के गफरुद्दीन मेवाती और जैसलमेर के तगा राम भील को मिलेगा पद्म श्री लोक कलाकारों की प्रेरक कहानी जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजस्थान का मान बढ़ाया

Jan 25, 2026 - 18:28
रेगिस्तान की गूंज और मेवात की तान राजस्थान के इन 2 'लोक-कलाकरों को मिलेगा पद्म श्री सम्मान

राजस्थान की लोक कला और संस्कृति के लिए साल 2026 एक ऐतिहासिक गौरव लेकर आया है गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर भारत सरकार ने राजस्थान के दो अनमोल रत्नों भरतपुर के गफरुद्दीन मेवाती जोगी और जैसलमेर के तगा राम भील को कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए पद्म श्री सम्मान देने की घोषणा की है इन दोनों कलाकारों ने अपना पूरा जीवन उन लोक विधाओं को बचाने में लगा दिया,जो आधुनिकता के दौर में दम तोड़ रही थीं।

गफरुद्दीन मेवाती जोगी भपंग और मेवाती गायकी के जादूगर

भरतपुर जिले के डीग के रहने वाले गफरुद्दीन मेवाती जोगी पिछले 60 वर्षों से अधिक समय से लोक संगीत की साधना कर रहे हैं उन्होंने मेवाती लोक विधाओं, विशेषकर 'पांडुन का कड़ा' और भपंग वादन को न केवल जीवित रखा, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई गफरुद्दीन केवल भपंग ही नहीं बल्कि अलगोजा चिकारा और जोगी सारंगी जैसे लगभग 12 पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाने में निपुण हैं उनकी गायकी में मेवाती जीवन,इतिहास और लोक आस्था का गहरा पुट मिलता है,जो श्रोताओं को एक अलग ही दुनिया में ले जाता है।

उनकी कला का जादू सात समंदर पार भी खूब गूंजा है। 

गफरुद्दीन ने लंदन,पेरिस कनाडा और फ्रांस जैसे देशों में अपनी प्रस्तुतियां दी है उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे इंग्लैंड की महारानी के समक्ष भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं पद्म श्री से पहले उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है।

तगा राम भील रेगिस्तान की मधुर गूंज 'अलगोजा' के पर्याय

जैसलमेर के मूल सागर निवासी तगा राम भील राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध अलगोजा वादक माने जाते हैं भील समुदाय से आने वाले तगा राम ने बचपन में ही अलगोजा वादन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था और पिछले तीन दशकों से वे इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं उनकी एक बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल अलगोजा बजाते ही नहीं,बल्कि स्वयं इन वाद्य यंत्रों का निर्माण भी करते हैं उनके द्वारा बनाए गए अलगोजा की मांग आज देश-विदेश के संगीत प्रेमियों के बीच रहती है।तगा राम भील ने अपनी कला के जरिए फ्रांस,अमेरिका, जापान और रूस जैसे देशों में राजस्थानी संस्कृति का परचम लहराया है सीमित संसाधनों और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अलगोजा,मटका और बांसुरी वादन में जो महारत हासिल की,वह आज के युवा कलाकारों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।

साधना और सफलता उपलब्धियों पर एक नजर

इन दोनों कलाकारों की जीवन यात्रा संघर्ष और अटूट साधना की अनूठी दास्तां पेश करती है गफरुद्दीन मेवाती जोगी ने जहां इंग्लैंड की महारानी के सामने प्रस्तुति देकर और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जीतकर मेवात का नाम रोशन किया,वहीं तगा राम भील ने अपनी कार्यशालाओं के जरिए विदेशी धरती पर राजस्थानी धुनें सिखाईं तगा राम ने राजस्थान डेजर्ट फेस्टिवल और ऑल इंडिया रेडियो जैसे मंचों के माध्यम से लोक संगीत को घर-घर पहुंचाया है।इन दोनों दिग्गजों को पद्म श्री मिलना इस बात का प्रमाण है कि सच्ची साधना कभी निष्फल नहीं जाती यह सम्मान राजस्थान की उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की जीत है, जो आज भी गांवों की मिट्टी से निकलकर वैश्विक पटल पर चमक रही है प्रदेशवासियों के लिए यह क्षण अत्यंत हर्ष और गर्व का है।