वसुंधरा राजे का छलका दर्द, राजनीति में महिलाओं का रास्ता आसान नहीं!

महिलाओं की राजनीति में भागीदारी पर वसुंधरा राजे ने कहा, शिक्षा और संघर्ष से ही मिलेगी बराबरी की पहचान

Jan 25, 2026 - 10:28
वसुंधरा राजे का छलका दर्द, राजनीति में महिलाओं का रास्ता आसान नहीं!

राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर एक बार फिर खुलकर अपनी बात रखी है। जयपुर में आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में तीन गुना अधिक मेहनत और संघर्ष करना पड़ता है। राजे ने इस दौरान शिक्षा को महिलाओं की सफलता और आत्मनिर्भरता की सबसे मजबूत कुंजी बताया।

जाट महिला शक्ति संगम में बोलीं वसुंधरा राजे

रिपोर्ट के अनुसार, वसुंधरा राजे ‘जाट महिला शक्ति संगम’ कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुई थीं। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति में महिलाओं को आज भी कई स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि समाज में बराबरी की बात तो होती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर महिलाओं को खुद को साबित करने के लिए कहीं अधिक प्रयास करने पड़ते हैं।

शिक्षा से ही खुलेगा समानता का रास्ता

वसुंधरा राजे ने अपने संबोधन में शिक्षा पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब तक महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक समानता का सपना पूरा नहीं हो सकता। राजे के अनुसार, शिक्षा महिलाओं को न केवल आत्मविश्वास देती है, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की क्षमता और नेतृत्व कौशल भी प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि शिक्षित महिला न सिर्फ अपने परिवार को आगे बढ़ाती है, बल्कि समाज और देश के विकास में भी अहम भूमिका निभाती है।

आजादी के बाद महिला साक्षरता में सुधार

पूर्व मुख्यमंत्री ने आजादी के बाद महिलाओं की स्थिति में आए बदलावों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के समय देश में महिला साक्षरता दर केवल 9 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर लगभग 65 प्रतिशत तक पहुंच गई है। उन्होंने इसे एक सकारात्मक बदलाव बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। राजे के अनुसार, जब तक हर वर्ग की महिलाओं तक शिक्षा नहीं पहुंचेगी, तब तक वास्तविक सशक्तिकरण संभव नहीं है।

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अब भी सीमित

राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी को लेकर वसुंधरा राजे ने आंकड़ों के जरिए स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि वर्ष 1957 के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी केवल तीन प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंची है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यह बढ़ोतरी संतोषजनक नहीं कही जा सकती।

संसद में महिला प्रतिनिधित्व के आंकड़े

राजे ने संसद में महिलाओं की मौजूदगी पर भी बात की। उन्होंने कहा कि पहली लोकसभा में केवल 22 महिला सांसद थीं, जबकि वर्तमान लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 74 हो गई है। इसी तरह, राज्यसभा में 1952 में महिला सदस्यों की संख्या 15 थी, जो अब बढ़कर 42 हो चुकी है। उनके अनुसार, यह प्रगति जरूर है, लेकिन महिलाओं की आबादी के अनुपात में यह संख्या अब भी काफी कम है।

बराबरी के बिना मजबूत नहीं होगा लोकतंत्र

अपने संबोधन के अंत में वसुंधरा राजे ने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब महिलाओं की भागीदारी सत्ता के स्तर पर भी पुरुषों के बराबर दिखाई देगी। उन्होंने कहा कि देश की आधी आबादी अगर निर्णय लेने की प्रक्रिया में पूरी तरह शामिल नहीं होगी, तो विकास अधूरा रहेगा। राजे ने महिलाओं से आगे बढ़ने, शिक्षा हासिल करने और नेतृत्व की भूमिका निभाने का आह्वान किया। कुल मिलाकर, वसुंधरा राजे का यह बयान न सिर्फ राजनीति में महिलाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है, बल्कि समाज को यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि समानता के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी कितनी मेहनत और बदलाव की जरूरत है।