ओरण पदयात्रा: 2° की ठंड में धोरों पर डटे पर्यावरण प्रेमी, जैसलमेर से जयपुर तक गूँजेगी आवाज

जैसलमेर में ओरण-गोचर भूमि बचाने के लिए तनोट माता मंदिर से शुरू हुई पदयात्रा। कड़ाके की ठंड और रेतीले धोरों के बीच पर्यावरण प्रेमियों का जज्बा। पूरी रिपोर्ट यहाँ पढ़ें।

Jan 22, 2026 - 15:37
ओरण पदयात्रा: 2° की ठंड में धोरों पर डटे पर्यावरण प्रेमी, जैसलमेर से जयपुर तक गूँजेगी आवाज

राजस्थान की मरुधरा अपनी वीरता के साथ-साथ प्रकृति के प्रति अपने अनन्य प्रेम के लिए भी जानी जाती है। जैसलमेर की ऐतिहासिक ओरण और गोचर भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने की मांग को लेकर 'ओरण पदयात्रा' का आगाज हो चुका है। तनोट माता मंदिर के आशीर्वाद के साथ शुरू हुई यह यात्रा अब जन-आंदोलन का रूप ले रही है।

कड़ाके की ठंड और रेतीले धोरों में रात्रि विश्राम

तनोट माता मंदिर से शुरू हुई यह पदयात्रा अपने पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ रही है। हाल ही में यात्रियों ने रणाऊ गांव के समीप खुले आसमान के नीचे रेतीले धोरों पर सर्द रात गुजारी। जैसलमेर के रेगिस्तान में रात का पारा गिरकर 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था, लेकिन पर्यावरण के इन प्रहरियों का हौसला कम नहीं हुआ। रणाऊ गांव और आसपास की ढाणियों के सैकड़ों लोगों ने फूल-मालाओं के साथ पदयात्रियों का जोरदार स्वागत किया। स्थानीय निवासी जयसिंह और उनके परिवार ने यात्रियों के भोजन की व्यवस्था कर मारवाड़ की 'अतिथि देवो भव:' की परंपरा को जीवंत किया।

"संघर्ष हमारी नियति है": पर्यावरण प्रेमियों का संकल्प

हाड़ कंपाने वाली इस ठंड में भी यात्रियों का जोश देखते ही बनता है। पदयात्रियों का कहना है कि वे पीढ़ियों से प्रकृति की रक्षा करते आए हैं और अब अपनी जमीन को बचाने के लिए किसी भी मौसम से टकराने को तैयार हैं। पर्यावरण प्रेमी सुमेर सिंह ने बताया कि रास्ते में पड़ने वाले हर गांव में उत्साह का माहौल है। उन्होंने कहा, "हमें न तो कोई मौसम रोक सकता है और न ही आंधी-तूफान। जैसलमेर की जमीन के संरक्षण के लिए जो भी प्रयास करने होंगे, हम करेंगे। लोगों का समर्थन और प्यार देखकर हमारी थकान मिट जाती है और हौसला और मजबूत हो जाता है।"

क्या है ओरण पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य?

जैसलमेर में 'ओरण' (पवित्र उपवन) और 'गोचर' (चारागाह) भूमि का पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व बहुत अधिक है। स्थानीय लोगों की आजीविका और पशुपालन इसी जमीन पर निर्भर है। यात्रियों की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

1. ओरण और गोचर भूमि को आधिकारिक तौर पर राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।

2. इन जमीनों के संरक्षण के लिए कड़े नियम बनाए जाएं।

3. स्थानीय पर्यावरण और जैव विविधता की रक्षा की जाए।

भोजराजपुरम की ओर बढ़ते कदम

यात्रा के दूसरे दिन की शुरुआत माँ तनोट की आरती के साथ हुई। भोपाल सिंह ने जानकारी दी कि दूसरे दिन यात्रियों का लक्ष्य लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर भोजराजपुरम गांव पहुंचना है, जहां रात्रि विश्राम का कार्यक्रम तय किया गया है। यात्रा के प्रति जनमानस का जुड़ाव इतना गहरा है कि रणाऊ के दर्जनों ग्रामीण भी इस यात्रा में शामिल हो गए हैं, जो जयपुर तक पदयात्रियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे।

एक पवित्र उद्देश्य के लिए एकजुटता

इस यात्रा में शामिल लोग इसे केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक 'पवित्र उद्देश्य' मान रहे हैं। उनका मानना है कि यह जैसलमेर की संस्कृति, आजीविका और भविष्य को बचाने की लड़ाई है। जैसलमेर के धोरों से शुरू हुई यह गूँज अब जयपुर के गलियारों तक पहुँचने की तैयारी में है। जिस तरह से आम जनता, युवा और बुजुर्ग इस मुहिम से जुड़ रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि राजस्थान का समाज अपनी प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए पूरी तरह सजग है।