Rajasthan HC on Police: गिरफ्तारी सजा नहीं! पुलिस की कार्यशैली पर हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार
जैसलमेर के बासनपीर मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकारा। कोर्ट ने कहा- आरोपियों की फोटो सोशल मीडिया पर डालना गैरकानूनी है। जानें क्यों जस्टिस फरजंद अली ने दी पुलिस को चेतावनी।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने हाल ही में जैसलमेर के बासनपीर मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्यशैली पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि "कानून व्यवस्था" बनाए रखने के नाम पर किसी भी नागरिक की मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान को कुचलने का अधिकार पुलिस के पास नहीं है। जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी का मतलब अपराधी होना नहीं है, और जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक हर व्यक्ति निर्दोष है।
क्या है बासनपीर का पूरा मामला?
यह विवाद जैसलमेर जिले के बासनपीर जुनी गांव से शुरू हुआ। बीती 10 जुलाई को गांव की पुरानी छतरियों के पुनर्निर्माण और मरम्मत कार्य को लेकर ग्रामीणों में भारी असंतोष था। विरोध प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और बच्चे जमा हुए। पुलिस ने इस विरोध को राजकार्य में बाधा माना और एफआईआर (संख्या 75/2025) दर्ज कर महिलाओं समेत कुल 23 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
थाने के बाहर फोटो खिंचवाना 'गैरकानूनी'
हाईकोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने न केवल पुरुषों, बल्कि महिलाओं और अविवाहित युवतियों को भी थाने के मुख्य गेट पर अपराधी की तरह बैठाकर उनकी तस्वीरें खींचीं। इन तस्वीरों को बाद में सोशल मीडिया और समाचार पत्रों में इस तरह प्रसारित किया गया जैसे वे सभी सजायाफ्ता अपराधी हों। कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह एक "खतरनाक परंपरा" बन चुकी है, जो भीड़ की मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए अपनाई जा रही है। ऐसी तस्वीरें व्यक्ति की सामाजिक छवि को उम्र भर के लिए धूमिल कर देती हैं, भले ही वह बाद में निर्दोष साबित हो जाए।
महिलाओं की गरिमा पर गहरी चोट
अदालत ने विशेष रूप से महिलाओं और युवतियों की तस्वीरें सार्वजनिक करने पर चिंता जताई। जस्टिस अली ने कहा कि ऐसी घटनाओं का असर केवल एक खबर तक सीमित नहीं रहता। यह उनके सामाजिक सम्मान, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य के वैवाहिक जीवन पर स्थायी चोट करता है। कोर्ट ने माना कि कुछ मामलों में तो गिरफ्तार लोगों को अपमानजनक स्थितियों में (अंडर-गारमेंट में) रखकर फोटो खींची गईं, जो पूरी तरह अमानवीय और कानून के विरुद्ध है।
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश
मामले की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश जारी किए हैं:
1. तस्वीरें हटाना: जैसलमेर एसपी को निर्देश दिए गए हैं कि बासनपीर मामले में गिरफ्तार सभी लोगों की तस्वीरें 24 घंटे के भीतर हर डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया से हटाई जाएं।
2. वकील का मामला: जोधपुर में एक वकील की गिरफ्तारी के बाद वायरल की गई तस्वीरों पर भी कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और उन्हें तत्काल हटाने का आदेश दिया।
3. सरकार से जवाब: कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि पुलिस की इस तरह की मनमानी और सार्वजनिक अपमान की घटनाओं को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
"वर्दी संविधान से ऊपर नहीं"
अदालत की यह टिप्पणी सीधे तौर पर पुलिस तंत्र के लिए एक चेतावनी है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि पुलिस की वर्दी किसी को कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं देती। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) या वर्तमान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का कोई भी प्रावधान पुलिस को यह अधिकार नहीं देता कि वे किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करें।
पूरा मामला ऐसे समझिए
बासनपीर मामले में हाईकोर्ट का यह रुख नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह फैसला याद दिलाता है कि न्याय की प्रक्रिया केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें व्यक्ति की निजता और सम्मान का संरक्षण भी शामिल है। अगर रक्षक ही भक्षक बनकर गरिमा का हनन करेंगे, तो व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास डगमगा जाएगा।