गिरफ्तार आरोपियों की तस्वीरें वायरल करना अमानवीय, राजस्थान हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने गिरफ्तार महिलाओं की तस्वीरें सार्वजनिक करने पर नाराजगी जताई, 24 घंटे में हटाने के आदेश दिए।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों, विशेषकर महिलाओं, की तस्वीरें सार्वजनिक करने की प्रथा पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने इसे न केवल अपमानजनक बल्कि मौलिक मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया है। यह आदेश कानून व्यवस्था और मानव गरिमा से जुड़े एक अहम मुद्दे को सामने लाता है, जिस पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
पुलिस की तस्वीरें खींचने की परंपरा पर गंभीर सवाल
कोर्ट के समक्ष आए मामले में यह सामने आया कि कई बार पुलिस गिरफ्तार किए गए लोगों को थाने के गेट पर बैठाकर उनकी तस्वीरें खींचती है और फिर उन्हें सोशल मीडिया व समाचार पत्रों में सार्वजनिक कर दिया जाता है। न्यायालय ने इस प्रथा को “बेहद परेशान करने वाली” करार दिया। कुछ मामलों में तो महिलाओं को उनके अंतःवस्त्रों में बैठाकर तस्वीरें ली गईं, जिसे अदालत ने अमानवीय और शर्मनाक बताया।
मानव गरिमा और सम्मान का उल्लंघन
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह आरोपी ही क्यों न हो, इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित नहीं किया जा सकता। इस तरह की तस्वीरें न केवल व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं, बल्कि समाज में उसे पहले से ही दोषी के रूप में पेश कर देती हैं। कोर्ट ने माना कि यह व्यवहार संविधान द्वारा प्रदत्त सम्मान के अधिकार के सीधे खिलाफ है।
निर्दोषता की धारणा पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने अपने आदेश में “निर्दोषता की धारणा” पर विशेष जोर दिया। न्यायाधीश ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी सिद्ध नहीं किया जाता, तब तक वह केवल आरोपी होता है, अपराधी नहीं। ऐसे में उसकी तस्वीरें सार्वजनिक करना उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है, जो कानून की मूल भावना के विपरीत है।
24 घंटे में तस्वीरें हटाने का आदेश
मामले में अदालत ने जोधपुर पुलिस आयुक्त को निर्देश दिए हैं कि एडवोकेट मोहन सिंह रतनू की तस्वीरों को 24 घंटे के भीतर सभी वेब पोर्टल्स, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य माध्यमों से हटाया जाए। कोर्ट ने इस आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू करने को कहा है, ताकि आगे कोई नुकसान न हो।
जैसलमेर एसपी को शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक (SP) को आदेश दिया है कि वे याचिका में लगाए गए आरोपों पर एक विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करें। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिए कि यदि ऐसी कोई तस्वीरें इंटरनेट पर मौजूद हैं, तो उन्हें तुरंत हटाने की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
भविष्य के लिए सुरक्षा उपायों पर जवाब तलब
कोर्ट ने पुलिस प्रशासन से यह भी पूछा है कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कौन-कौन से प्रभावी और संस्थागत सुरक्षा उपाय अपनाए गए हैं। न्यायालय ने संकेत दिए कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि ठोस व्यवस्था लागू करनी होगी।
28 जनवरी को होगी अगली सुनवाई
इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी 2026 को तय की गई है। कोर्ट इस दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों और दिए गए जवाबों की समीक्षा करेगा। यह सुनवाई आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
न्यायालय का सख्त संदेश
अपने निष्कर्ष में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की हरकतें न केवल अमानवीय हैं, बल्कि संविधान द्वारा दी गई गारंटियों की जड़ों पर हमला करती हैं। अदालत का यह आदेश पुलिस व्यवस्था को संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।