बाड़मेर पंचायत चुनाव 37 जिला परिषद सदस्य चुनेंगे जिला प्रमुख 269 से बनेंगे 17 प्रधान अब 625 ग्राम पंचायतें

बाड़मेर और बालोतरा के अलग-अलग जिले बनने के बाद प्रशासनिक नक्शे के साथ-साथ राजनीतिक समीकरण भी पूरी तरह बदल गए हैं। जिला कलेक्टर टीना डाबी ने पंचायत समिति और जिला परिषद वार्डों का अंतिम प्रकाशन कर दिया। अब बाड़मेर जिले में

Jan 24, 2026 - 09:39
बाड़मेर पंचायत चुनाव 37 जिला परिषद सदस्य चुनेंगे जिला प्रमुख 269 से बनेंगे 17 प्रधान अब 625 ग्राम पंचायतें

बाड़मेर, 24 जनवरी 2026: राजस्थान के बाड़मेर और बालोतरा के अलग-अलग जिले बनने के बाद न सिर्फ प्रशासनिक मानचित्र में बड़ा बदलाव आया है, बल्कि राजनीतिक गणित भी पूरी तरह से पलट गया है। पंचायत और जिला परिषद स्तर पर वार्डों का पुनर्गठन कर नई सीमाएं तय की गई हैं, जिससे स्थानीय नेताओं की रणनीतियां हिल गई हैं। जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव और चुनावी दांव-पेंच अब नए सिरे से तैयार होने लगे हैं। जिला कलेक्टर टीना डाबी ने शुक्रवार देर शाम पंचायत समिति वार्डों का अंतिम प्रकाशन कर इस बदलाव पर मुहर लगा दी है। अब सवाल यह है कि आगामी पंचायतीराज चुनावों में ये नए वार्ड किसके पक्ष में गेम-चेंजर साबित होंगे?

नया बाड़मेर: छोटा लेकिन दमदार, संख्या में देखें बदलाव

बाड़मेर जिले का नया स्वरूप काफी दिलचस्प है। अब यहां 17 पंचायत समितियां, 625 ग्राम पंचायतें और 2791 राजस्व गांव शामिल होंगे। इनके आधार पर 17 प्रधान और 37 जिला परिषद सदस्य चुने जाएंगे, जो आगे जिला प्रमुख का चुनाव करेंगे। प्रशासनिक ढांचा भी मजबूत हुआ है:7 उपखंड 

11 तहसीलें

7 उप-तहसीलें

17 पंचायत समितियां

राज्य सरकार पंचायतीराज चुनाव की तैयारी में जुटी हुई है। इसी के तहत जिलेवार पुनर्गठन लगभग पूरा हो चुका है। अब चुनाव इन्हीं नई पंचायत समितियों और जिला परिषद वार्डों के आधार पर होंगे। लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा मुद्दा उभरा है: जनसंख्या का असंतुलन। कहीं वार्ड बेहद कम आबादी पर बने हैं, तो कहीं दोगुनी से ज्यादा जनसंख्या वाले वार्डों ने विवाद को हवा दे दी है।

जनसंख्या का 'असमान खेल': छोटे वार्ड से बड़े वार्ड तक की दूरी

पंचायत समितियों में वार्ड गठन के दौरान जनसंख्या का संतुलन कायम रखने में कमी नजर आती है। कुछ वार्डों में न्यूनतम 1697 की आबादी है, जबकि अन्य में 8639 तक पहुंच गई है। यहां देखें पंचायत समिति-वार विवरण: 

बाड़मेर ग्रामीण: 3043 से 6906 आबादी

आडेल: 2079 से 6332

बाड़मेर: 4560 से 8639

बाटाडू: 1809 से 3946

बायतु: 3680 से 7380

भियाड़: 2731 से 5339

विशाला: 1697 से 5183

चौहटन: 5476 से 8589

धनाऊ: 5235 से 7423

डूगेरों का तला: 2242 से 3466

फागलिया: 5282 से 7550

गडरारोड: 4468 से 7728

मांगता: 2015 से 4209

रामसर: 5276 से 8254

सेड़वा: 4756 से 8047

शिव: 3339 से 6541

लीलसर: 2419 से 4271

जिला परिषद स्तर पर भी यही असमानता साफ दिखती है। उदाहरण के लिए:

वार्ड संख्या 5: 26,955 आबादी, रामसर पंचायत समिति की 12 ग्राम पंचायतें 

वार्ड संख्या 22: 47,394 आबादी, आडेल पंचायत समिति की 24 ग्राम पंचायतें

खास बात यह है कि आडेल पंचायत समिति का जिला परिषद में केवल एक ही वार्ड बनाया गया है, जो राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। स्थानीय जानकारों का कहना है कि यह असंतुलन चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि कम आबादी वाले वार्डों में व्यक्तिगत प्रभाव ज्यादा चल सकता है, जबकि बड़े वार्डों में सामूहिक वोट बैंक निर्णायक होंगे।

राजनीतिक 'मास्टरस्ट्रोक' या 'गेम ऑफ थ्रोन्स'?

वार्ड गठन में सिर्फ जनसंख्या ही नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों का भी गहरा असर दिखाई देता है। कुछ पंचायत समितियों में वार्डों की आबादी इस तरह तय की गई है कि जातीय और क्षेत्रीय प्रभाव को ध्यान में रखा गया लगता है:भियाड़ और शिव: 30-35 हजार आबादी पर वार्ड 

बायतु और बाटाडू: 36-43 हजार

बाड़मेर, बाड़मेर ग्रामीण और विशाला: 28-46 हजार

आडेल: करीब 47 हजार पर एक वार्ड

सेड़वा और फागलिया: तीन पंचायत समितियों को मिलाकर 29-42 हजार

धनाऊ और लीलसर: 31-37 हजार

चौहटन: 40-43 हजार

गडरारोड-रामसर: 26-37 हजार आबादी पर वार्ड

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिसीमन सत्ताधारी दल के फायदे के लिए किया गया हो सकता है। उदाहरण के लिए, आडेल का एकमात्र वार्ड एक मजबूत जातीय समूह को लाभ पहुंचा सकता है, जबकि सेड़वा-फागलिया का मेल-अप विरोधी खेमे को कमजोर कर सकता है। स्थानीय नेता अब नए सिरे से गठबंधन और रणनीतियां बना रहे हैं। एक वरिष्ठ राजनेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "यह बंटवारा सिर्फ जिलों का नहीं, बल्कि वोट बैंक का भी है। अब देखना है कि कौन इस नए नक्शे पर राज करेगा।"

 आगामी चुनाव: नई चुनौतियां, नई संभावनाएंनए परिसीमन के बाद बाड़मेर की राजनीति में बड़ा उलटफेर होने की संभावना है। स्थानीय नेताओं की रणनीतियां, जातीय व क्षेत्रीय समीकरण और चुनावी गणित पूरी तरह से बदल गए हैं। पंचायतीराज चुनावों में अब इन नए वार्डों पर आधारित मुकाबला होगा, जहां छोटे-बड़े वार्डों का असर साफ दिखेगा। क्या सत्ताधारी दल इस बदलाव का फायदा उठाएगा, या विपक्ष नए समीकरणों से बाजी मारेगा? आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा। फिलहाल, बाड़मेर के गांवों में चर्चा का विषय यही है: "नया नक्शा, नई लड़ाई!"