बीकानेर ऊंट महोत्सव 2026: ऊंटों की फर कटिंग में दिखा अरावली और खेजड़ी बचाने का संदेश

बीकानेर ऊंट महोत्सव का आगाज, फर कटिंग कला के जरिए अरावली, खेजड़ी और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

Jan 9, 2026 - 16:03
बीकानेर ऊंट महोत्सव 2026: ऊंटों की फर कटिंग में दिखा अरावली और खेजड़ी बचाने का संदेश

रेगिस्तान की संस्कृति, परंपरा और रंगों का उत्सव माने जाने वाले प्रसिद्ध बीकानेर ऊंट महोत्सव की शुरुआत आज हो गई। 11 जनवरी तक चलने वाले इस महोत्सव में देश-विदेश से पर्यटक और कला प्रेमी पहुंच रहे हैं। ऊंटों की साज-सज्जा, लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां और पारंपरिक प्रतियोगिताएं इस आयोजन को खास बना रही हैं। इस वर्ष भी ऊंट महोत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण ऊंटों पर की जाने वाली अनोखी फर कटिंग कला बनी हुई है।

30 साल पुरानी परंपरा, आज भी बरकरार आकर्षण

बीकानेर ऊंट महोत्सव में फर कटिंग कला की परंपरा करीब तीन दशकों पुरानी है। इस कला में ऊंटों की फर को इस तरह काटा और तराशा जाता है कि उस पर चित्र, आकृतियां और संदेश उभरकर सामने आते हैं। यह काम बेहद बारीकी और धैर्य के साथ किया जाता है। हर साल महोत्सव में इस प्रतियोगिता को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक जुटते हैं।

पर्यावरण संरक्षण बना इस बार की थीम

इस वर्ष फर कटिंग प्रतियोगिता में पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखा गया है। 20 से अधिक ऊंट इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे हैं, जिनकी फर पर सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश उकेरे गए हैं। ऊंटों की फर पर “अरावली बचाओ”, “खेजड़ी बचाओ” जैसे संदेश साफ नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली अमृता देवी के बलिदान की पूरी कथा को भी ऊंटों की फर पर कलात्मक रूप में दर्शाया गया है। यह पहल दर्शकों को परंपरा के साथ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश दे रही है।

कला नहीं, साधना है फर कटिंग

ऊंटों पर फर कटिंग करना आसान काम नहीं है। यह कला विशेष कौशल, अनुभव और धैर्य की मांग करती है। कलाकारों के अनुसार, फर कटिंग साल में केवल तीन महीनों तक ही संभव होती है, क्योंकि ऊंटों की फर उसी दौरान इस कला के लिए उपयुक्त रहती है। एक-एक डिजाइन को उकेरने में कई घंटे लग जाते हैं और जरा-सी चूक पूरी आकृति को बिगाड़ सकती है।

बिग्गा रामसरा गांव से मिली पहचान

ऊंटों पर गहराई वाले चित्र बनाकर फर कटिंग कला को नई पहचान दिलाने का श्रेय बिग्गा रामसरा गांव के अमराराम नायक को जाता है। उन्होंने इस कला में नए प्रयोग किए और ऊंटों की फर पर जीवंत आकृतियां उकेरीं। उनके शिष्य रामलाल बताते हैं कि अमराराम नायक ने अपनी कला के दम पर करीब पांच वर्षों तक ऊंट महोत्सव में पहला स्थान हासिल किया। आज उनके शिष्य और अन्य कलाकार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

लोकसंस्कृति और सामाजिक चेतना का संगम

बीकानेर ऊंट महोत्सव केवल मनोरंजन या पर्यटन तक सीमित नहीं है। यह आयोजन राजस्थान की लोकसंस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली को सामने लाने का एक सशक्त मंच बन चुका है। ऊंटों की फर कटिंग के जरिए दिए जा रहे सामाजिक और पर्यावरणीय संदेश इस बात का प्रमाण हैं कि लोककलाएं समय के साथ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ रही हैं।

पर्यटकों में खासा उत्साह

महोत्सव के पहले दिन से ही पर्यटकों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। देश-विदेश से आए सैलानी ऊंटों की अनोखी सजावट और फर कटिंग कला की तस्वीरें और वीडियो अपने कैमरों में कैद कर रहे हैं। स्थानीय कलाकारों और पशुपालकों को भी इस आयोजन से पहचान और रोजगार दोनों मिल रहा है।बीकानेर ऊंट महोत्सव एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि परंपरा और आधुनिक सोच साथ चलें तो कला केवल देखने की चीज नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी बन सकती है।