मनरेगा बनाम जी रामजी एप: रोजगार के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत उजागर

सरकार के 125 दिन रोजगार दावे बनाम मनरेगा की सच्चाई, सिर्फ 2% परिवारों को ही मिला 100 दिन का काम।

Jan 29, 2026 - 12:31
मनरेगा बनाम जी रामजी एप: रोजगार के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत उजागर

राज्य सरकार की ओर से “विकसित भारत–जी रामजी” एप को रोजगार का नया माध्यम बताकर प्रचार किया जा रहा है। इस एप के जरिए 125 दिन रोजगार की गारंटी देने का दावा किया गया है। सरकार का कहना है कि अब ग्रामीणों को काम के लिए गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा। लेकिन जब इन दावों की तुलना मनरेगा के जमीनी आंकड़ों से की जाती है, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।

मनरेगा में 100 दिन का काम अब भी सपना

मनरेगा योजना के तहत प्रति परिवार 100 दिन का रोजगार देने का प्रावधान है, लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश में केवल 2 प्रतिशत परिवारों को ही पूरे 100 दिन का काम मिल पाया है। यह आंकड़ा सरकार की योजनाओं की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जिन परिवारों के लिए यह योजना सबसे अहम है, उन्हें इसका पूरा लाभ अब तक नहीं मिल सका है।

जिलों में बेहद कमजोर स्थिति

सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के पांच जिलों में तो हालात और भी चिंताजनक हैं। इन जिलों में 0.25 प्रतिशत से भी कम परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला है। कुछ जिलों में यह आंकड़ा 0.8 प्रतिशत तक ही सिमटा हुआ है। इससे साफ है कि मनरेगा का लाभ अधिकांश जरूरतमंद परिवारों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

गिने-चुने परिवारों तक सिमटा लाभ

प्रदेश में कुल सक्रिय परिवारों की संख्या लगभग 68 लाख से अधिक है, लेकिन इनमें से केवल करीब 94 हजार परिवार ही ऐसे हैं, जिन्होंने 100 दिन का काम पूरा किया है। वहीं कुल सक्रिय श्रमिकों की संख्या 1.18 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है, जिनमें से बहुत कम लोगों को नियमित रोजगार मिल पाया है। यह अंतर सरकार के दावों और वास्तविकता के बीच की खाई को दिखाता है।

कुछ जिलों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन

हालांकि कुछ जिलों में स्थिति थोड़ी बेहतर भी देखने को मिलती है। आंकड़ों के अनुसार 33 जिलों में बाड़मेर सबसे ऊपर है, जहां करीब 9,679 परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला। इसके अलावा उदयपुर में 8,943, आदिवासी बहुल क्षेत्र में 7,571 और जैसलमेर में 7,545 परिवारों ने 100 दिन का काम पूरा किया है। लेकिन कुल परिवारों की संख्या के मुकाबले यह आंकड़े भी बहुत कम हैं।

मजदूरी और काम की अनियमितता बड़ी समस्या

ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी समय पर न मिलना और काम की अनियमितता भी बड़ी समस्या बनी हुई है। कई मजदूरों का कहना है कि काम मिलने में देरी होती है और भुगतान भी समय पर नहीं होता। इसी कारण मजबूरी में लोग अब भी शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जबकि सरकार गांव में ही रोजगार मिलने का दावा कर रही है।

नया एप, पुरानी चुनौतियां

विकसित भारत–जी रामजी एप को रोजगार की नई उम्मीद के रूप में पेश किया गया है। सरकार का कहना है कि इस एप के जरिए 125 दिन रोजगार की व्यवस्था की जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब मनरेगा जैसी पुरानी योजना में 100 दिन का रोजगार भी पूरी तरह नहीं मिल पा रहा, तो नई व्यवस्था जमीन पर कितनी कारगर साबित होगी।

आंकड़े  बोले, दावे कमजोर

कुल मिलाकर, सरकार के प्रचार और आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। जब तक योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद परिवारों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक गांव से पलायन रोकने और रोजगार देने के दावे अधूरे ही रहेंगे। मनरेगा के अनुभव यह संकेत देते हैं कि केवल नई योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर मजबूत क्रियान्वयन से ही हालात बदले जा सकते हैं।