एमबीआर पीजी कॉलेज की 29 बीघा भूमि आवंटन पर विधानसभा में गूंजा मुद्दा
बालोतरा स्थित एमबीआर राजकीय पीजी महाविद्यालय की 29 बीघा भूमि अन्य सरकारी कार्यालयों के निर्माण हेतु आवंटित करने के प्रस्ताव को लेकर शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने राजस्थान विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा।
जयपुर/बालोतरा।
शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने एमबीआर पीजी महाविद्यालय, बालोतरा की भूमि को अन्य सरकारी कार्यालयों के भवन निर्माण हेतु आवंटित किये जाने के संबंध में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव विधानसभा में रखा। कार्य संचालन नियम-131 के अंतर्गत प्रस्तुत इस प्रस्ताव के माध्यम से भाटी ने प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री का ध्यान एक ऐसे निर्णय की ओर आकर्षित किया, जिसे उन्होंने “शैक्षणिक हितों के प्रतिकूल और छात्र भविष्य के साथ अन्याय” करार दिया।
85 बीघा में से 29 बीघा पर आवंटन की अनुमति
बालोतरा स्थित एमबीआर राजकीय पीजी महाविद्यालय क्षेत्र का एक प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थान है, जिसकी कुल लगभग 85 बीघा भूमि है। आरोप है कि कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय द्वारा इस भूमि में से लगभग 29 बीघा भूमि अन्य सरकारी प्रयोजनों के लिए आवंटित करने हेतु अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी कर दिया गया है।
इन 29 बीघा में से—
• लगभग 24 बीघा भूमि महाविद्यालय परिसर की चारदीवारी के भीतर स्थित खेल मैदान की भूमि है,
• जबकि लगभग 5 बीघा भूमि परिसर के बाहर, सड़क मार्ग के निकट स्थित है।
विधायक भाटी ने कहा कि यह मात्र जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की आकांक्षाओं, खेल प्रतिभाओं और भविष्य की शैक्षणिक संभावनाओं का आधार है।
खेल मैदान से लेकर भविष्य के विस्तार तक पर संकट
भाटी ने सदन में स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस भूमि को आवंटित करने की अनुमति दी गई है, वह वर्तमान में विद्यार्थियों की खेल गतिविधियों, एनसीसी जैसी सह-शैक्षणिक गतिविधियों तथा अन्य अकादमिक उपयोगों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने आगाह किया कि भविष्य में महाविद्यालय के विस्तार, नए संकायों की स्थापना, अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं के निर्माण, खेल अधोसंरचना के विकास, एनसीसी इकाई की स्थापना और रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए यही भूमि आधार बनेगी। यदि इसे अन्य कार्यालय भवनों के निर्माण में उपयोग कर लिया गया, तो महाविद्यालय के दीर्घकालिक विकास की संभावनाएं सीमित हो जाएंगी।
बिना परामर्श लिया गया निर्णय, छात्रों में रोष
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया कि इस भूमि आवंटन के लिए सहमति कॉलेज आयुक्तालय स्तर पर दी गई, जबकि इस प्रक्रिया में महाविद्यालय प्रशासन, प्राध्यापकों या छात्र प्रतिनिधियों से किसी प्रकार का विचार-विमर्श नहीं किया गया।
इस एकतरफा निर्णय के चलते छात्र समुदाय में व्यापक असंतोष व्याप्त है। विद्यार्थियों द्वारा विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन शुरू कर दिया गया है। स्थानीय स्तर पर यह मुद्दा शिक्षा बनाम प्रशासनिक सुविधा की बहस का रूप ले चुका है।
“सरकारी भवन बनेंगे, लेकिन शिक्षा का भविष्य ढह जाएगा”
विधानसभा में भाटी ने कहा कि किसी भी सरकार की प्राथमिकता शिक्षा होनी चाहिए, न कि शैक्षणिक परिसरों की भूमि पर प्रशासनिक भवन खड़े करना। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार के पास अन्य वैकल्पिक स्थल उपलब्ध नहीं हैं, जहाँ इन कार्यालयों का निर्माण किया जा सके?
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाविद्यालय की भूमि का अन्य प्रयोजनों हेतु उपयोग करना विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों और संस्थान के समग्र विकास पर सीधा प्रहार है। यह निर्णय केवल वर्तमान बैच ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अवसरों को भी सीमित कर देगा।
एनओसी रद्द करने की मांग
शिव विधायक ने उच्च शिक्षा मंत्री से आग्रह किया कि इस विषय को गंभीरता से संज्ञान में लिया जाए और महाविद्यालय की भूमि आवंटन संबंधी अनापत्ति प्रमाण पत्र को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए। साथ ही, प्रस्तावित राजकीय कार्यालयों के निर्माण हेतु अन्यत्र वैकल्पिक भूमि आवंटित की जाए, ताकि महाविद्यालय में अध्ययनरत हजारों विद्यार्थियों के हित सुरक्षित रह सकें।
भाटी ने यह भी कहा कि पश्चिमी राजस्थान जैसे सीमांत क्षेत्र में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या पहले ही सीमित है। ऐसे में उपलब्ध संसाधनों को और संकुचित करना विकास के दावों के विपरीत है।