'बीजेपी-कांग्रेस के बीच गुप्त समझौता!'—हनुमान बेनीवाल का बड़ा आरोप, बाड़मेर के वोट समीकरणों पर खड़े किए सवाल
बेनीवाल ने बीजेपी-कांग्रेस पर मिलीभगत का आरोप लगाया और बाड़मेर चुनाव के अजीबोगरीब वोट आंकड़ों पर चिंता जताई है।
जयपुर/बाड़मेर: राजस्थान की राजनीति में अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए मशहूर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के सुप्रीमो और सांसद हनुमान बेनीवाल ने एक बार फिर प्रदेश की सियासत में हलचल पैदा कर दी है। बेनीवाल ने बीजेपी और कांग्रेस के बीच "अघोषित गठबंधन" का दावा करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर सीधा निशाना साधा है।
वोटों के गणित पर उठाया सवाल
बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट के चुनावी परिणामों की ओर इशारा करते हुए बेनीवाल ने एक बेहद चौंकाने वाला विश्लेषण पेश किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में वोटों का ध्रुवीकरण इस कदर उलझाया गया है कि जिसके पास जमीन पर मात्र डेढ़ लाख वोट का आधार था, वो अचानक छह लाख वोट ले जाता है। वहीं, जिसके पास साढ़े छह लाख वोटों की मजबूत ताकत थी, उसे महज डेढ़ लाख पर समेट दिया गया। बेनीवाल ने जनता को आगाह करते हुए कहा कि इस "वोट शिफ्टिंग" के पीछे की साजिश को समझने की जरूरत है।
"सरकार आपकी नहीं, भजनलाल की है"
जनता से मुखातिब होते हुए बेनीवाल ने तंज भरे लहजे में कहा कि लोग छोटी-छोटी बातों पर भावुक हो जाते हैं और उनके पास कागजों का ढेर लेकर पहुँच जाते हैं। उन्होंने कहा, "लोग मेरे पास ट्रांसफर और फाइलें बदलवाने की सिफारिशें लेकर आते हैं, जैसे राजस्थान में मेरी अपनी सरकार हो। आपको यह समझना होगा कि सरकार मेरी नहीं, भजनलाल शर्मा की है।"
बेनीवाल ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उनसे सबसे ज्यादा चिढ़ते हैं और उन्हें देखना तक पसंद नहीं करते।
बीजेपी-कांग्रेस की 'रात वाली' दोस्ती
हनुमान बेनीवाल ने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच पर्दे के पीछे गहरी दोस्ती चल रही है। उन्होंने दावा किया:
"मुख्यमंत्री कहते हैं कि कांग्रेसी उनके भाई हैं और वे उन्हें गले लगाते हैं, लेकिन उनका असली मकसद 'हनुमान' को रोकना है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों का एक ही एजेंडा है—हनुमान का इलाज करना। ये लोग दिन में एक-दूसरे का विरोध करते हैं, लेकिन रात को एक हो जाते हैं।"
कार्यकर्ताओं को दी नसीहत
बेनीवाल ने अपने समर्थकों को वास्तविकता से रूबरू कराते हुए कहा कि वे सिस्टम की जटिलता को समझें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक शासन प्रशासन में उनका सीधा हस्तक्षेप नहीं है, तब तक फाइलों और ट्रांसफर के खेल में उलझने के बजाय जनता को एकजुट होकर अपनी ताकत पहचाननी चाहिए।
मारवाड़ और जाट राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती इस बयानबाजी ने आने वाले दिनों में राजस्थान की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत दे दिए हैं।