माफिया और अफसरों का गठजोड़ अब नहीं चलेगा!" - मंत्री किरोड़ीलाल मीणा ने बेनकाब किया महाघोटाला

राजस्थान में फसल बीमा योजना में बड़ा घोटाला उजागर, 32 हजार मामलों में अनियमितता से 128 करोड़ रुपये अटके

Feb 16, 2026 - 12:56
माफिया और अफसरों का गठजोड़ अब नहीं चलेगा!" - मंत्री किरोड़ीलाल मीणा ने बेनकाब किया महाघोटाला

राजस्थान विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान फसल बीमा से जुड़े एक मामले में कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा ने सदन को बताया कि क्षेमा इंश्योरेंस कंपनी से जुड़े मामलों में गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं। प्रारंभिक जांच में कंपनी के कुछ कर्मचारी, बैंक अधिकारी और बाहरी माफिया तत्वों की संलिप्तता के संकेत मिले हैं।

मंत्री ने बताया कि फसल बीमा योजना के तहत करीब 32,000 इंटीमेशन फॉर्म की जांच में बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। इन फॉर्मों में किसानों की फसल क्षति शून्य प्रतिशत दिखाई गई, जबकि वास्तविक नुकसान 50 से 70 प्रतिशत तक था। नुकसान शून्य दर्शाए जाने के कारण किसानों को मिलने वाला लगभग 128 करोड़ रुपये का बीमा भुगतान अटक गया।

कृषि मंत्री के अनुसार, क्षेमा इंश्योरेंस कंपनी ने भुगतान की राशि अपने पास रखकर उस पर ब्याज अर्जित किया। यह मामला रावला थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एफआईआर नंबर 0210 दर्ज किया गया है। जांच भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 336, 337, 340 और 2(बी) एस के तहत चल रही है। प्राथमिक जांच में सामने आया है कि यह घोटाला नागौर, बीकानेर, चूरू, सांचौर और जालौर जिलों से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि किन-किन स्तरों पर मिलीभगत हुई और किसानों को नुकसान कैसे पहुंचाया गया। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार की प्रारंभिक राय में संबंधित बीमा कंपनी डिफॉल्टर प्रतीत हो रही है। इस संबंध में भारत सरकार को पत्र लिखकर अनुरोध किया गया है कि भविष्य में कंपनी को कोई टेंडर न दिया जाए। साथ ही राज्य सरकार ने पीसीआरसी और एसआरसी में सुनवाई के बाद किसानों को 122 करोड़ रुपये का भुगतान दिलाने का निर्णय लिया है।

किरोड़ीलाल मीणा ने सालासर क्षेत्र में एसबीआई बैंक से जुड़े एक अन्य मामले का भी जिक्र किया। जांच में पाया गया कि 71 मामलों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाते खोलकर ऋण स्वीकृत किए गए। बीकानेर जिले की गजनेर तहसील के तहसीलदार ने स्पष्ट किया कि ऐसे नामों का कोई वैध किसान रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

जांच में यह भी सामने आया कि बैंक शाखा में किसानों के जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, फिर भी बचत खातों के आधार पर प्रीमियम कार्ड जारी करने की प्रक्रिया चल रही थी। यदि 13 लाख 78 हजार रुपये के प्रीमियम कार्ड जारी हो जाते, तो राज्य और केंद्र सरकार पर करीब 9 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता।