अरावली पर अवैध खनन का कहर, 25 फीसदी पर्वतमाला हो चुकी है नष्ट
अरावली में अवैध खनन तेज, नई सरकारी परिभाषा से हजारों पहाड़ियां संरक्षण से बाहर
दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में शामिल अरावली आज अपने अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रही है। अवैध खनन और नीतिगत ढील ने इस पर्वतमाला को धीरे-धीरे खत्म करने की स्थिति पैदा कर दी है। पर्यावरणविदों और रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में अरावली का बड़ा हिस्सा या तो नष्ट हो चुका है या बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
अरावली का दो-तिहाई भाग राजस्थान से होकर गुजरता है। अलवर, एनसीआर, भानगढ़, सरिस्का और नीमकाथाना जैसे इलाकों में अवैध खनन खुलेआम हो रहा है। कई खानें कागजों में बंद हैं, लेकिन जमीन पर मशीनें, क्रेशर और डंपरों की आवाजाही साफ संकेत देती है कि खनन जारी है। स्थानीय लोग खनन माफियाओं के डर से खुलकर बोलने से बचते हैं। कई जगहों पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि अवैध खनन के कारण अरावली की करीब 25 प्रतिशत पहाड़ियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं, जबकि कुछ आकलनों में यह नुकसान 35 प्रतिशत तक बताया गया है। इसी बीच पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अरावली की एक नई परिभाषा प्रस्तावित की गई है, जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही संरक्षित अरावली माना जाएगा। इस परिभाषा के लागू होने से राजस्थान की हजारों छोटी पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी।
फॉरेस्ट सर्वे से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में अधिकांश पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंचाई की हैं। ऐसे में आशंका है कि इन क्षेत्रों में खनन गतिविधियां और तेज होंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊंचाई को जमीन से मापना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है और इससे अरावली को अपूरणीय क्षति होगी।
अरावली सिर्फ पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह भूजल रिचार्ज, मानसून संतुलन और रेगिस्तान को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। अगर इसे बचाने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरण पर पड़ेगा।