खेजड़ी बचाने की जंग: अस्पताल के बिस्तर से मां की पुकार, सरकार बनाए सख्त कानून
खेजड़ी बचाओ आंदोलन में अनशन से बीमार हुई शहीद पर्यावरण प्रेमी की मां, सख्त कानून की मांग तेज
खेजड़ी बचाओ आंदोलन के बीच एक भावुक और झकझोर देने वाला दृश्य सामने आया है। पर्यावरण प्रेमी स्वर्गीय राधेश्याम पेमाणी (विश्नोई) की मां रतनी देवी और पत्नी निरमा विश्नोई तीन दिनों तक अन्न-जल त्याग कर आंदोलन के समर्थन में बैठी थीं। अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद रतनी देवी को जैसलमेर के प्रिया हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जबकि पत्नी निरमा विश्नोई को प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई।
हॉस्पिटल में भर्ती 60 वर्षीय रतनी देवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “खेजड़ी के लिए अगर जान भी चली जाए तो कोई गम नहीं।” उनका कहना है कि उनके बेटे राधेश्याम ने भी वन्यजीवों और पर्यावरण की रक्षा करते हुए अपने प्राण गंवाए। ऐसे में अगर परिवार को भी बलिदान देना पड़े तो उन्हें कोई पछतावा नहीं है। उनकी एकमात्र मांग है कि सरकार खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए सख्त और प्रभावी कानून बनाए।
बताया गया कि दोनों महिलाएं 3 फरवरी से खेजड़ी बचाओ आंदोलन के समर्थन में अनशन पर थीं। संतों के हस्तक्षेप और आंदोलन की रणनीति के तहत उन्होंने अनशन तोड़ दिया, लेकिन लंबे समय तक भूखे रहने के बाद अचानक भोजन शुरू करने से उनकी सेहत बिगड़ गई। डॉक्टरों के अनुसार यही वजह है कि रतनी देवी को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
प्रिया हॉस्पिटल की डॉक्टर राजेश्वरी धनदेव ने बताया कि तीन दिनों तक भोजन न करने के कारण रतनी देवी की आंतों में ऐंठन और सूजन आ गई है। उन्हें उल्टियां और अत्यधिक कमजोरी महसूस हो रही है। फिलहाल उन्हें ग्लूकोज और तरल आहार दिया जा रहा है और लगातार निगरानी में रखा गया है।
स्वर्गीय राधेश्याम विश्नोई को पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए जाना जाता था। सड़क हादसे में उनकी मौत भी वन्यजीवों को बचाने के प्रयास के दौरान ही हुई थी। अब उनका परिवार उसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहा है। इस घटना के बाद समाज और पर्यावरण प्रेमियों में गहरा रोष है और सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। आंदोलन से जुड़े लोगों और परिवार की मांग है कि खेजड़ी वृक्ष की कटाई रोकने के लिए विशेष कानून बनाया जाए। साथ ही वन्यजीव तस्करों और अवैध कटाई करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।