कतर की विदेशी जमीन पर टूटा एक गरीब परिवार का चिराग: रमेश मेघवाल की संदिग्ध मौत के 20 दिन बाद भी घर नहीं लौटा शव

बाड़मेर जिले के बालोतरा-गिड़ा क्षेत्र के सोहड़ा गांव के 19 वर्षीय रमेश कुमार मेघवाल की 17 नवंबर 2025 को कतर (दोहा) में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। रोजगार के लिए 11 अक्टूबर को दो साथियों हीराराम मेघवाल और रोशन अली के साथ गए रमेश को वहाँ लगातार उत्पीड़न व शोषण का शिकार होना पड़ा।

Dec 7, 2025 - 14:17
कतर की विदेशी जमीन पर टूटा एक गरीब परिवार का चिराग: रमेश मेघवाल की संदिग्ध मौत के 20 दिन बाद भी घर नहीं लौटा शव
सांसद बेनीवाल ने विदेश मंत्री को सौंपा ज्ञापन

बाड़मेर, 7 दिसंबर 2025: रोजगार की तलाश में खाड़ी देशों की ओर रुख करने वाले राजस्थान के युवाओं की कहानियां अक्सर सफलता की नहीं, बल्कि दर्दनाक त्रासदियों की बन जाती हैं। ऐसा ही एक दर्दनाक अध्याय तब जुड़ गया जब बाड़मेर जिले के बालोतरा क्षेत्र के गिड़ा तहसील के सोहड़ा गांव के 19 वर्षीय युवक रमेश कुमार मेघवाल की सऊदी अरब के दोहा (कतर) में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। मौत को 20 दिन से अधिक हो चुके हैं, लेकिन उनका पार्थिव शरीर अभी तक भारत नहीं लाया जा सका है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की यह घटना न केवल एक पारिवारिक त्रासदी है, बल्कि विदेशी मजदूरी पर जाने वाले लाखों भारतीय युवाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़ी कर रही है।

 उत्पीड़न की चपेट में फंसे युवा: कैसे शुरू हुई यह यात्रा?

मिली जानकारी के अनुसार, रमेश कुमार मेघवाल पुत्र खमाराम मेघवाल ने बेहतर भविष्य की उम्मीदें संजोए 11 अक्टूबर 2025 को अपने दो साथियों—सवाऊ मूलराज निवासी हीराराम मेघवाल और जाजवा निवासी रोशन अली—के साथ रोजगार के सिलसिले में दोहा रवाना हो गए थे। तीनों युवा आर्थिक तंगी से जूझते अपने परिवारों का बोझ हल्का करने के सपने लेकर निकले थे। लेकिन वहां पहुंचते ही उनकी जिंदगी मुश्किलों की भंवर में फंस गई। स्थानीय सूत्रों और परिवार के बयानों से पता चलता है कि काम के दौरान इन युवाओं को लगातार उत्पीड़न, मानसिक दबाव और शोषण का सामना करना पड़ा। नियोक्ताओं द्वारा अनुचित व्यवहार, लंबे काम के घंटे और असुरक्षित माहौल ने इनकी जिंदगी को नर्क बना दिया।13 नवंबर को रमेश की परिजनों से अंतिम बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने अपनी परेशानियां साझा कीं। उसके बाद उनका फोन बंद हो गया। 17 नवंबर को परिवार को सदमे से भर देने वाली खबर मिली—रमेश अपने कमरे में मृत अवस्था में पाए गए। मौत का सटीक कारण अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। परिवार और ग्रामीण इसे पूरी तरह संदिग्ध मानते हैं। "यह आत्महत्या नहीं हो सकती। रमेश इतना मजबूत था, लेकिन उत्पीड़न ने उसे तोड़ दिया होगा। हमें निष्पक्ष जांच चाहिए," परिवार के एक सदस्य ने बताया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन कतर की कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलताओं के कारण प्रगति धीमी है।

फंसे साथी: भय और तनाव की कैद में

रमेश की मौत के बाद उनके साथ गए दोनों युवक—हीराराम मेघवाल और रोशन अली—भी कतर में फंस चुके हैं। दोनों मानसिक तनाव और भय के साये में जी रहे हैं। वे स्वदेश लौटना चाहते हैं, लेकिन वीजा, कानूनी बाधाएं और नियोक्ताओं का दबाव उन्हें रोक रहा है। "हमारे बच्चे वहां अकेले हैं, हर पल खतरा महसूस हो रहा है। कब कोई और बुरा होगा, यह सोचकर नींद नहीं आती," रोशन अली के परिवार ने गुहार लगाई है। ये युवक भी उसी शोषण का शिकार हुए, जिसने रमेश की जिंदगी छीन ली। 

सांसद की सक्रियता: विदेश मंत्री से मुलाकात और आश्वासन

इस मामले ने राजनीतिक स्तर पर हलचल मचा दी है। बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा क्षेत्र के सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने तुरंत संज्ञान लिया। 6 दिसंबर को उन्होंने नई दिल्ली में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से मुलाकात की और एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में प्रमुख मांगें रखी गईं:रमेश मेघवाल का पार्थिव शरीर भारत सरकार के खर्च पर शीघ्र लाने की व्यवस्था। 

मौत की परिस्थितियों की गहन और निष्पक्ष जांच।

फंसे दोनों साथियों की तत्काल सुरक्षित स्वदेश वापसी।

आवश्यक कानूनी कार्रवाई और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता।

सांसद बेनीवाल ने बताया, "परिवार लगातार प्रशासन से संपर्क कर रहा है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यह संवेदनशील मामला है, सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए।" विदेश मंत्री जयशंकर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तुरंत रियाद स्थित भारतीय दूतावास को निर्देश जारी किए। उन्होंने सांसद को आश्वासन दिया कि पार्थिव शरीर जल्द भारत पहुंचाया जाएगा और दोनों युवकों की वापसी को प्राथमिकता दी जाएगी। दूतावास ने पहले ही स्थानीय अधिकारियों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है।इससे पहले, सांसद बेनीवाल ने 22 नवंबर को पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और विदेश मंत्रालय से फोन पर बात की। उन्होंने स्थानीय प्रशासन से भी रिपोर्ट मांगी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी और अन्य नेताओं ने भी हस्तक्षेप की मांग की है।

गरीबी का दंश: विदेशी मजदूरी पर सवालों का सैलाब

यह घटना राजस्थान के पश्चिमी इलाकों में विदेशी रोजगार की कठोर वास्तविकता को उजागर करती है। बाड़मेर-बालोतरा जैसे क्षेत्रों में सूखाग्रस्त अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी ने हजारों युवाओं को खाड़ी देशों की ओर धकेल दिया है। लेकिन वहां कठोर श्रम कानून, शोषण और असुरक्षा ने इनकी जिंदगियां दांव पर लगा दी हैं। सांसद बेनीवाल ने विदेश मंत्री के संवेदनशील रुख के लिए आभार जताते हुए कहा, "क्षेत्र के गरीब परिवार रोजगार के लिए विदेश जाते हैं। उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए ठोस नीति जरूरी है—जैसे प्री-डिपार्चर ट्रेनिंग, दूतावास की सक्रिय निगरानी और त्वरित सहायता तंत्र।"मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे 'आधुनिक गुलामी' बता रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स भी खाड़ी देशों में भारतीय मजदूरों की मौतों पर चिंता जताती हैं। राजस्थान सरकार ने पहले भी ऐसे मामलों में हेल्पलाइन शुरू की है, लेकिन जमीनी स्तर पर कमी बनी हुई है। 

परिवार की गुहार: न्याय और सहारा की आस

सोहड़ा गांव में शोक का माहौल है। रमेश के पिता खमाराम, जो मजदूरी कर परिवार चलाते हैं, सदमे में हैं। "हमारा इकलौता बेटा था, सपने लेकर गया था। अब सिर्फ न्याय चाहिए," उन्होंने कहा। ग्रामीण लगातार जिलाधिकारी कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं। दूतावास की ओर से कोई आधिकारिक अपडेट न आने से चिंता बढ़ रही है।