जब सदन बना क्लासरूम चेयर की ठक-ठक और अनुशासन की तलाश

राजस्थान विधानसभा में बाड़मेर विधायक प्रियंका चौधरी द्वारा किसानों की फसलों को जंगली सुअरों से हो रहे नुकसान का मुद्दा उठाए जाने के दौरान सदन में अनुशासनहीनता का दृश्य देखने को मिला।

Feb 19, 2026 - 13:42
जब सदन बना क्लासरूम चेयर की ठक-ठक और अनुशासन की तलाश

राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही को देखते हुए कई बार स्कूल के दिनों की याद ताज़ा हो जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए अध्यापक को हस्तक्षेप करना पड़ता था, और यहाँ माननीय सदस्यों को संयमित रखने के लिए अध्यक्ष को बार-बार चेयर ठोकनी पड़ती है।

हाल ही में बाड़मेर की विधायक प्रियंका चौधरी जब किसानों की फसलों को जंगली सुअरों सहित अन्य कारणों से हो रहे भारी नुकसान का अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा सदन में उठा रही थीं, उसी दौरान सदन का वातावरण बार-बार शोर-शराबे और आपसी चर्चाओं से बाधित होता रहा। स्थिति यह बनी कि विधानसभा अध्यक्ष को संसदीय कार्य मंत्री को सूचित करते हुए बार-बार सदन को टोकना पड़ा।

यह दृश्य किसी कक्षा से कम नहीं लगा—जहाँ पढ़ाई के बीच बच्चे आपस में बातचीत में उलझ जाते हैं और शिक्षक को अनुशासन बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ता है। दुर्भाग्यवश, प्रदेश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था में भी प्रतिदिन कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिल रहा है।

किसानों की फसलें जंगली सुअरों और अन्य कारणों से बर्बाद हो रही हैं। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या लगातार बढ़ रही है और किसानों को आर्थिक रूप से भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। ऐसे संवेदनशील विषय पर चर्चा के दौरान अपेक्षा थी कि सदन गंभीरता से विचार करेगा, समाधान की दिशा में ठोस कदम सुझाए जाएंगे और संबंधित विभागों को जवाबदेह बनाया जाएगा।

लेकिन जब माननीय सदस्य आपसी बातचीत में व्यस्त दिखाई देते हैं, तो न केवल मुद्दे की गंभीरता कम होती है, बल्कि सदन की गरिमा भी प्रभावित होती है।

विधानसभा में उठाए जाने वाले विषय केवल किसी एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं होते। वे पूरे प्रदेश के नागरिकों की समस्याओं से जुड़े होते हैं। यदि कोई मुद्दा सीधे किसी सदस्य के क्षेत्र से संबंधित न भी हो, तो भी उसे गंभीरता से सुनना लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का हिस्सा है।

चेयर को बार-बार ठोकने की नौबत आना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि इससे प्रदेश ही नहीं, देशभर में विधानसभा की सकारात्मक छवि भी प्रभावित होती है। लोकतंत्र की गरिमा इसी में है कि मतभेद हों, लेकिन संवाद अनुशासित और सार्थक हो।