इकलौती बेटी संतोष मालू का वैराग्य पथ: “दासी नहीं, रानी बनने जा रही हूं” लिखकर ली भावुक विदाई

बाड़मेर की 28 वर्षीय संतोष मालू 5 मार्च को जैसलमेर में जैन दीक्षा लेकर साध्वी बनेंगी। कोरोना काल में आध्यात्मिक प्रभाव से उनका जीवन बदल गया।

Mar 3, 2026 - 19:29
इकलौती बेटी संतोष मालू का वैराग्य पथ: “दासी नहीं, रानी बनने जा रही हूं” लिखकर ली भावुक विदाई

बाड़मेर

ट्रांसपोर्ट व्यापारी की इकलौती बेटी संतोष मालू (28) ने सांसारिक जीवन का त्याग कर संयम मार्ग अपनाने का संकल्प लिया है। 5 मार्च को जैसलमेर में वे जैन दीक्षा ग्रहण कर साध्वी बनेंगी। सोमवार रात बाड़मेर स्थित उनके निवास पर परिवार और समाजजनों ने भावुक माहौल में उन्हें विदाई दी।

घर से निकलते समय संतोष ने दीवार पर लिखा— “दासी नहीं, रानी बनने जा रही हूं।” यह संदेश उनके निर्णय और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया। सांसारिक सुख-सुविधाओं को त्यागते हुए वे दीक्षा स्थल के लिए रवाना हो गईं।

संतोष बताती हैं कि उनके पिता रतनलाल मालू ट्रांसपोर्ट व्यवसायी हैं और माता सुशीला देवी गृहिणी हैं। वे तीन भाइयों के बीच इकलौती बहन हैं। बी.कॉम तक शिक्षा प्राप्त कर चुकी संतोष आगे एम.कॉम करने का सपना देख रही थीं, लेकिन कोरोना काल में हुए आचार्य भगवंत के चातुर्मास ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

उन्होंने बताया कि चातुर्मास के दौरान आध्यात्मिक प्रवचनों और साधना ने उनके मन में वैराग्य की भावना जागृत कर दी। पहले कभी दीक्षा का विचार नहीं आया था, लेकिन तपस्या और साधना में रुचि बढ़ती गई और अंततः संयम जीवन अपनाने का निर्णय दृढ़ हो गया।

संतोष 5 मार्च को जिन मणिप्रभ सूरीश्वर के करकमलों से दीक्षा ग्रहण करेंगी। यह दीक्षा समारोह जैसलमेर में आयोजित हो रहे चादर महोत्सव के दौरान होगा, जहां देशभर से सैकड़ों जैन साधु-संत उपस्थित रहेंगे। संतोष ने कहा कि इतने बड़े संतसमूह के सानिध्य में दीक्षा मिलना उनके लिए सौभाग्य और अपार खुशी की बात है।

पिछले चार वर्षों के वैराग्य काल में संतोष 8 माह का गुरुकुल वास कर चुकी हैं। इस दौरान उन्होंने करीब 2 हजार किलोमीटर का पैदल विहार किया और तप-तपस्या व साधना के मार्ग पर अग्रसर रहीं।

उन्होंने बताया कि पिता रतनलाल मालू ने दीक्षा के लिए शीघ्र अनुमति दे दी थी, लेकिन मां को मनाने में समय लगा। आखिरकार मां भी बेटी के निर्णय से सहमत हो गईं।

संतोष का कहना है कि सांसारिक जीवन में दिखने वाला सुख क्षणिक होता है। वास्तविक और स्थायी सुख केवल संयम में है। उन्होंने कहा कि जैन समाज में जन्म लेना सौभाग्य की बात है और इस जीवन में यदि साधना नहीं की, तो आगे के भाव कैसे सुधरेंगे।

सोशल मीडिया पर उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि वहां केवल दिखावा है, वास्तविक शांति आत्मसंयम में ही मिलती है।

दीवार पर लिखे संदेश को लेकर संतोष ने स्पष्ट किया कि समाज में धारणा है कि विवाह कर ही स्त्री ‘रानी’ बनती है और संयम मार्ग अपनाने वाली ‘दासी’। लेकिन प्रभु के मार्ग पर चलने वाली हर आत्मा रानी होती है, दासी नहीं।

उनके इस निर्णय से परिवार और समाज में भावुकता के साथ-साथ आध्यात्मिक गर्व का वातावरण है।