अरावली और सरिस्का पर खनन का आरोप, गहलोत ने केंद्र सरकार पर साधा निशाना
अरावली की परिभाषा बदलने और सरिस्का क्षेत्र में खनन को लेकर अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर अरावली पर्वतमाला और संरक्षित वन क्षेत्रों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि अरावली को बचाने के नाम पर उसे खनन के लिए खोलने की साजिश की जा रही है और इसके लिए संस्थागत ढांचे को कमजोर किया गया है। गहलोत ने केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के उस बयान को भ्रामक बताया, जिसमें कहा गया है कि अरावली के केवल 0.19 प्रतिशत हिस्से में ही खनन संभव होगा।
गहलोत का कहना है कि सरकार जनता को आंकड़ों में उलझाकर असली मंशा छिपा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि 5 सितंबर 2023 को पर्यावरण संरक्षण के लिए बनी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) को एक नोटिफिकेशन के जरिए कमजोर कर पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कर दिया गया। पहले यह समिति सुप्रीम कोर्ट के प्रति जवाबदेह थी, लेकिन अब इसके सदस्य सरकार तय करती है। इससे इसकी स्वतंत्रता खत्म हो गई है और यह केवल सरकारी फैसलों पर मुहर लगाने वाली संस्था बनकर रह गई है।
उन्होंने याद दिलाया कि इसी CEC की सख्त रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 2011 में कर्नाटक में अवैध खनन के मामले में कार्रवाई हुई थी। गहलोत ने सवाल उठाया कि क्या सरकार को डर था कि अगर CEC स्वतंत्र रहती तो अरावली और सरिस्का जैसे क्षेत्रों में खनन की अनुमति नहीं मिलती।
सरिस्का टाइगर रिजर्व का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 में क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट की सीमा बदलने का प्रस्ताव लाया गया, ताकि बंद पड़ी 50 से अधिक खदानों को फिर से शुरू किया जा सके। इस प्रस्ताव को 48 घंटे के भीतर राज्य और केंद्र स्तर पर मंजूरी दे दी गई, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए रोक लगा दी।
गहलोत ने यह भी आरोप लगाया कि खदानें फिर से चालू करवाने के लिए धन संग्रह की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची है। उनका कहना है कि इन घटनाओं से साफ है कि सरकार की मंशा संरक्षित क्षेत्रों में भी खनन की राह खोलने की है। उन्होंने कहा कि राजस्थान अपनी प्राकृतिक धरोहर के साथ इस तरह के खिलवाड़ को स्वीकार नहीं करेगा।