ओरण बचाओ आंदोलन: जैसलमेर से जयपुर तक 725 KM की ऐतिहासिक पदयात्रा
तनोट से जयपुर तक 725 KM की ओरण बचाओ पदयात्रा, आस्था, पर्यावरण और अधिकारों की आवाज बनी।
राजस्थान में ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की मांग को लेकर ग्रामीणों का संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है। जैसलमेर जिले से शुरू हुई ‘ओरण बचाओ पदयात्रा’ अब केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बन चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि ओरण देवी-देवताओं की पूजनीय भूमि है, जिसका संरक्षण वे पीढ़ियों से करते आ रहे हैं, लेकिन आज विकास के नाम पर इसका अस्तित्व सिमटता जा रहा है।
ढोलक-भजनों के साथ पैदल यात्रा
इस संघर्ष को नई दिशा देने के लिए जिले के युवाओं ने खड़ताल, ढोलक और लोक-देवताओं के भजनों के साथ पैदल यात्रा निकालने का फैसला किया। ‘टीम ओरण’ के नाम से पहचाने जा रहे ये योद्धा तनोट माता मंदिर से जयपुर तक करीब 725 किलोमीटर की यात्रा पर निकले हैं। इस यात्रा में 10 साल के बच्चों से लेकर 75 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं। सभी के मन में एक ही डर है कि कहीं उनके पूर्वजों की विरासत खत्म न हो जाए।
रोजाना 30 किलोमीटर का कठिन सफर
सूरज उगते ही ‘जय तनोट राय’ के जयकारों के साथ यह काफिला आगे बढ़ जाता है। रोजाना करीब 30 किलोमीटर का सफर तय किया जा रहा है। बर्फीली हवाएं, तेज धूप और थकान के बावजूद पदयात्रियों का हौसला कमजोर नहीं पड़ता। 21 जनवरी को शुरू हुई यह यात्रा 26 जनवरी तक करीब 150 किलोमीटर का सफर तय कर ‘भाग का गांव फांटा’ पहुंची, जहां ग्रामीणों ने भोजन और पानी की व्यवस्था कर पदयात्रियों का स्वागत किया।
विकास के खिलाफ नहीं, आस्था के पक्ष में
इस पदयात्रा में पूर्व विधायक रूपा राम धनदेव के बेटे हरीश भी शामिल हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद सरकारी नौकरी कर चुके हरीश का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार नहीं किया जा सकता जो ओरण जैसी आस्था की भूमि को खत्म कर दे। उनका साफ कहना है कि जब तक ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जाएगा, यह संघर्ष जारी रहेगा।
कानूनी और सामाजिक लड़ाई साथ-साथ
दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ में पीएचडी कर रहे वकील धर्मवीर सिंह सांकड़ा भी पदयात्रा में शामिल हैं। वे इसे केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि पर्यावरण और विरासत की लड़ाई मानते हैं। उनका कहना है कि पैरों में छाले पड़ सकते हैं, लेकिन इरादे मजबूत हैं। जरूरत पड़ी तो कोर्ट में भी लड़ाई लड़ी जाएगी और सड़क पर भी आवाज उठाई जाएगी।
भजन-कीर्तन बना ऊर्जा का स्रोत
दिनभर की थकान के बाद पदयात्री सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करते हैं। उनका कहना है कि यही उनका पावर बैंक है। यहां कोई छोटा-बड़ा नहीं है, सभी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं और ओरण भूमि को बचाने का संकल्प दोहराते हैं। यह लड़ाई अब जमीन से आगे बढ़कर अस्मिता की लड़ाई बन चुकी है।
चांधन में भव्य स्वागत, सेवण चारागाह का शुभारंभ
पदयात्रा के सातवें दिन चांधन कस्बे में इसका भव्य स्वागत किया गया। समाजसेवी लखसिंह चांधन के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने नगाड़ों और फूल मालाओं से टीम ओरण का अभिनंदन किया। डेलासर मठ के महंत महादेवपूरी ने भी आशीर्वाद दिया। इस दौरान गायों के लिए बोए गए सेवण घास के चारागाह का उद्घाटन भी किया गया।
पंचायतीराज चुनाव में चेतावनी
चांधनवासियों ने साफ चेतावनी दी कि अगर ओरण और गोचर भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया तो आने वाले पंचायतीराज चुनाव में सरकार के खिलाफ वोट किया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि जो ओरण, गोचर, नदी-नालों और देवल के संरक्षण की बात करेगा, जनता उसी के साथ खड़ी होगी।
साम्प्रदायिक एकता की मिसाल
इस आंदोलन को मुस्लिम समुदाय का भी खुला समर्थन मिल रहा है। मार्ग में आने वाली मुस्लिम ढाणियों और गांवों में पदयात्रियों का स्वागत किया जा रहा है और गौमाता व ओरण संरक्षण के समर्थन में नारे लगाए जा रहे हैं। यह पदयात्रा न केवल ओरण के संरक्षण की मांग कर रही है, बल्कि सामाजिक एकता की मिसाल भी पेश कर रही है।