रविन्द्र सिंह भाटी का सरकार पर बड़ा हमला,युवाओं के सपनों पर सियासत नहीं,अवसर चाहिए

शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने राजस्थान विधानसभा में युवा एवं खेल मुद्दों पर चर्चा के बाद प्रदेश सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए।

Feb 19, 2026 - 18:36
रविन्द्र सिंह भाटी का सरकार पर बड़ा हमला,युवाओं के सपनों पर सियासत नहीं,अवसर चाहिए

“राजस्थान का युवा सिर्फ़ गार्ड बनने के लिए नहीं बना है” - शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी 

गुरुवार को राजस्थान विधानसभा में युवा एवं खेल मामलों पर हुई चर्चा के बाद शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने मीडिया से मुखर और तीखी वार्ता करते हुए प्रदेश सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए। उनका स्वर केवल विपक्ष की आलोचना भर नहीं था, बल्कि उस करोड़ों युवाओं की व्यथा का प्रतिनिधित्व था, जिनके हाथों में डिग्रियाँ हैं, पर अवसर नहीं।

भाटी ने कहा, “भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। देश की लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। राजस्थान में भी युवाओं की संख्या अत्यधिक है। लेकिन विडंबना यह है कि चाहे विधानसभा हो या संसद, युवाओं का प्रतिनिधित्व नगण्य है। दस प्रतिशत का आंकड़ा भी मुश्किल से पार होता है। जिनके भविष्य का सवाल है, वही निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं।”

बेरोजगारी: दावों और हकीकत के बीच खाई

भाटी ने बेरोजगारी के मुद्दे को सबसे बड़ी चुनौती बताते हुए कहा कि हर सरकार रोजगार और स्किल डेवलपमेंट के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग है। विभिन्न श्रम सर्वेक्षणों और स्वतंत्र एजेंसियों के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राजस्थान लंबे समय तक देश में सर्वाधिक बेरोजगारी दर वाले राज्यों में गिना जाता रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में संचालित अधिकांश स्किल सेंटर केवल कागज़ों तक सीमित हैं। “एक भी ऐसा मॉडल स्किल सेंटर नहीं दिखता जहाँ युवाओं को आधुनिक उद्योगों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण दिया जा रहा हो। डिग्री मिल रही है, कौशल नहीं; प्रमाणपत्र मिल रहा है, रोजगार नहीं।”

राइजिंग राजस्थान’ या ‘राइजिंग कॉर्पोरेट’?

उद्योगों के नाम पर आयोजित भव्य कार्यक्रम राइजिंग राजस्थान पर निशाना साधते हुए भाटी ने कहा कि इस इवेंट में 27 लाख करोड़ रुपये से अधिक के एमओयू सोलर कंपनियों के साथ किए गए।

“हर कैबिनेट बैठक में सोलर कंपनियों को भूमि आवंटित की जा रही है। हजारों बीघा भूमि निजी हाथों में जा रही है। लेकिन इसके बदले में राजस्थान के युवाओं को क्या मिला? क्या उन्हें स्थायी रोजगार मिला? क्या उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया? क्या उन्हें उद्योग में भागीदारी मिली?”

उन्होंने तीखे शब्दों में कहा, “क्या राजस्थान का युवा केवल सोलर प्लांट में गार्ड बनने के लिए बना है?”

भाटी ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य में उत्पन्न बिजली का बड़ा हिस्सा अन्य राज्यों को जाता है, जबकि राजस्थान को वही बिजली ऊँचे दामों पर खरीदनी पड़ती है। भूमि आवंटन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन बढ़ रहा है और स्थानीय पारिस्थितिकी—जीव-जंतु, वृक्ष और संस्कृति—पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

खेलों में चमक-दमक, ज़मीनी ढांचा शून्य

खेलों के मुद्दे पर भाटी ने सरकार की प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अनेक खेलों के कोचों के पद रिक्त हैं, खेल अधिकारियों के पद वर्षों से भरे नहीं गए, और जो अस्थायी नियुक्तियाँ हुई हैं उन्हें स्थायी करने की दिशा में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

हाल ही में आयोजित खेलो इंडिया का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपये खर्च कर भव्य आयोजन किए जाते हैं, लेकिन मूलभूत ढांचे की कमी जस की तस है। “कुछ प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों की संख्या बेहद सीमित रही। जब प्रशिक्षण, कोचिंग और बुनियादी सुविधाएँ ही नहीं होंगी तो प्रतिभा कहाँ से निखरेगी?”

उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश का सर्वोच्च खेल सम्मान महाराणा प्रताप खेल पुरस्कार वर्ष 2017-18 के बाद नियमित रूप से आयोजित नहीं हुआ। “राजस्थान जैसे बड़े राज्य से आज तक कोई स्थायी ओलंपिक पदक विजेता तैयार नहीं हुआ। यह केवल खिलाड़ियों की कमी नहीं, नीति और इच्छाशक्ति की कमी है।”

जनता पूछे जवाब

भाटी ने जनता से आह्वान किया कि वे अपने मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों से सवाल करें—“भूमि आवंटन के बदले प्रदेश को क्या मिला? युवाओं को कितने स्थायी रोजगार मिले? कितने प्रशिक्षण केंद्र वास्तव में कार्यरत हैं? खेलों के लिए बजट का कितना हिस्सा ढांचागत विकास पर खर्च हुआ?”

उन्होंने कहा, “अगर सरकार सचमुच युवाओं को राष्ट्रनिर्माण की शक्ति मानती है, तो उसे भाषणों से आगे बढ़कर संरचनात्मक बदलाव करने होंगे—उद्योगों में स्थानीय रोजगार की बाध्यता, आधुनिक स्किल यूनिवर्सिटी, जिला स्तर पर स्पोर्ट्स अकादमी, और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया।”

“युवा सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, भविष्य हैं। और भविष्य से समझौता किसी भी राज्य के लिए सबसे बड़ा जोखिम है।”