अरावली विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट में, नई परिभाषा पर आज वैकेशन बेंच की सुनवाई

अरावली की नई परिभाषा पर बढ़ा विवाद, सुप्रीम कोर्ट की वैकेशन बेंच आज मामले की सुनवाई करेगी

Dec 29, 2025 - 09:37
अरावली विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट में, नई परिभाषा पर आज वैकेशन बेंच की सुनवाई

अरावली पर्वतमाला को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने आ गया है। देशभर में, खासतौर पर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में अरावली की नई परिभाषा को लेकर विरोध तेज हो गया है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए आज सुनवाई तय की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली वैकेशन बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी। इस बेंच में जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल होंगे। यह मामला वैकेशन कोर्ट की सूची में पांचवें नंबर पर रखा गया है।

100 मीटर ऊंचाई की नई परिभाषा बनी विवाद की जड़

विवाद की मुख्य वजह अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा है। केंद्र सरकार की ओर से गठित समिति ने सिफारिश की थी कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद से ही पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने इस फैसले पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी।

1985 से चला आ रहा है अरावली संरक्षण का मामला

अरावली पर्वतमाला से जुड़ा यह मामला कोई नया नहीं है। वर्ष 1985 से अरावली के संरक्षण से संबंधित कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में चलती आ रही हैं। गोदावर्मन और एम.सी. मेहता जैसे अहम मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को व्यापक संरक्षण दिया है। इन मामलों में कोर्ट ने अरावली को पर्यावरण संतुलन, जल संरक्षण और जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना था।

विरोध का कारण क्या है?

नई परिभाषा के विरोधियों का कहना है कि यदि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली से बाहर कर दिया गया, तो इससे बड़े पैमाने पर खनन को बढ़ावा मिलेगा। खासकर राजस्थान और हरियाणा में कई छोटी पहाड़ियां हैं, जो अरावली की प्राकृतिक श्रृंखला का हिस्सा मानी जाती रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इन पहाड़ियों को संरक्षण से बाहर करने से भूजल स्तर, वन्यजीव और स्थानीय जलवायु पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

केंद्र सरकार का पक्ष

वहीं केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को गलत बताया है। सरकार का कहना है कि अरावली के संरक्षण को लेकर किसी तरह की ढील नहीं दी जा रही है। केंद्र के अनुसार, नई परिभाषा केवल तकनीकी स्पष्टता के लिए लाई गई है और इससे अरावली क्षेत्र में संरक्षण के प्रयास प्रभावित नहीं होंगे।

हरियाणा के पूर्व अधिकारी ने दी कानूनी चुनौती

इस विवाद के बीच हरियाणा के वन विभाग के पूर्व अधिकारी आर.पी. बलवान ने भी सुप्रीम कोर्ट में नई परिभाषा को चुनौती दी है। उन्होंने गोदावर्मन मामले में याचिका दाखिल करते हुए केंद्र सरकार, राजस्थान, हरियाणा और पर्यावरण मंत्रालय को पक्षकार बनाया है। कोर्ट ने इस याचिका पर सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिए हैं। इस याचिका पर शीतकालीन अवकाश के बाद विस्तृत सुनवाई होने की संभावना है।

24 दिसंबर को खनन पर लगी रोक

विवाद के बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने 24 दिसंबर को एक अहम कदम उठाया। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर रोक लगाने के आदेश जारी किए। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अरावली श्रृंखला में किसी भी नई खनन लीज को मंजूरी नहीं दी जाएगी। सभी राज्य सरकारों को इस आदेश का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं।

आज की सुनवाई से क्या उम्मीद?

आज होने वाली सुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट इस दौरान केंद्र और राज्य सरकारों को नए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों की नजर भी इस सुनवाई पर टिकी हुई है। आने वाले समय में यह तय होगा कि अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और संरक्षण की दिशा क्या होगी।