"एक कॉल में काम!" सरहद समृद्धि यात्रा में मानवेंद्र सिंह जसोल का एक्शन, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस।

सरहद समृद्धि यात्रा के दौरान जुम्मा फकीर की बस्ती में पेयजल संकट देख मानवेंद्र सिंह जसोल ने मौके पर ही अधिकारी को फोन लगा दिया। क्या सिस्टम कॉल से चलेगा या होगा स्थायी समाधान?

Dec 28, 2025 - 22:07
"एक कॉल में काम!" सरहद समृद्धि यात्रा में मानवेंद्र सिंह जसोल का एक्शन, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस।

बाड़मेर/राजस्थान: राज्य में सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में जहाँ एक ओर उत्सव का माहौल है, वहीं दूसरी ओर सियासी पारा भी चढ़ता जा रहा है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में व्यस्त है, तो विपक्ष जनता के मुद्दों को लेकर सरकार की घेराबंदी कर रहा है। इसी गहमागहमी के बीच मानवेंद्र सिंह जसोल की 'सरहद समृद्धि यात्रा' का दूसरा चरण इन दिनों न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि डिजिटल दुनिया में भी जबरदस्त चर्चा का विषय बना हुआ है।

जनसमस्याओं के बीच सरहद समृद्धि यात्रा

मानवेंद्र सिंह जसोल की इस यात्रा का उद्देश्य सरहदी इलाकों के निवासियों की समस्याओं को समझना और उनके साथ संवाद स्थापित करना है। यात्रा के दूसरे चरण के दौरान जैसे ही उनका काफिला जुम्मा फकीर की बस्ती पहुँचा, वहाँ की स्थिति ने सबका ध्यान खींच लिया। ग्रामीणों ने अपनी सबसे बुनियादी जरूरत—पीने के पानी—को लेकर अपनी व्यथा सुनाई। ग्रामीणों का कहना था कि वे लंबे समय से पेयजल संकट से जूझ रहे हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

मौके पर समाधान: जब लगा एक फोन कॉल

बस्ती के लोगों की शिकायत सुनते ही मानवेंद्र सिंह जसोल ने सक्रियता दिखाई। उन्होंने न केवल ग्रामीणों की बात धैर्य से सुनी, बल्कि बिना देरी किए मौके से ही संबंधित विभागीय अधिकारी को फोन लगा दिया। उन्होंने अपने मोबाइल से संदेश भेजकर तुरंत बस्ती में नल कनेक्शन की व्यवस्था करने के निर्देश दिए।

जसोल का यह 'क्विक एक्शन' यानी त्वरित हस्तक्षेप वहाँ मौजूद लोगों के लिए उम्मीद की किरण बना। इस घटना ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि यदि जनप्रतिनिधि संवेदनशील हों, तो प्रशासनिक तंत्र को गति दी जा सकती है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस: प्रशंसा या तंज?

जैसे ही इस घटनाक्रम का वीडियो इंटरनेट पर आया, यह आग की तरह फैल गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोग दो गुटों में बँटे नजर आ रहे हैं:

1. समर्थकों का रुख: कई यूजर्स ने इस कार्य की सराहना करते हुए लिखा, "नेता हो तो ऐसा, एक कॉल में काम हो गया।" उनका मानना है कि जनता को कागजी कार्रवाई से ज्यादा ऐसे जनप्रतिनिधियों की जरूरत है जो मौके पर समस्या का समाधान करा सकें।

2. आलोचकों का तंज: वहीं, कुछ लोग इसे सिस्टम की विफलता के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए लिखा— "अब तो कॉल करने से पहले ही काम हो जाएगा।" आलोचकों का तर्क है कि अगर हर काम के लिए बड़े नेता के फोन की जरूरत पड़े, तो आम आदमी सिस्टम पर कैसे भरोसा करे?

क्या सिस्टम केवल 'कॉल' से चलता है?

इस पूरे वाकये ने एक पुरानी और गहरी बहस को फिर से जन्म दे दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या हमारा प्रशासनिक तंत्र केवल किसी रसूखदार व्यक्ति के फोन कॉल का इंतजार करता है? क्या जमीनी स्तर पर समस्याओं का कोई स्थायी समाधान नहीं है? जहाँ कुछ लोग इसे त्वरित न्याय (Instant Justice) मान रहे हैं, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी मशीनरी को इतना मजबूत होना चाहिए कि बिना किसी फोन कॉल के भी जनता की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।

सियासी गलियारों में हलचल

वर्तमान में जब राज्य सरकार के दो साल पूरे होने पर मंत्री और विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं, ऐसे में मानवेंद्र सिंह जसोल की यात्रा एक अलग लकीर खींच रही है। उनकी यात्रा का 'जनसंवाद' मॉडल और अधिकारियों को सीधे जवाबदेह ठहराने का तरीका उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान दिला रहा है।