शिक्षकों के तबादलों पर हाईकोर्ट सख्त, शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

राजस्थान हाईकोर्ट ने शैक्षणिक सत्र के बीच 4527 प्रिंसिपलों के तबादलों को अनुचित बताते हुए सरकार की नीति पर सवाल खड़े किए।

Jan 7, 2026 - 17:56
शिक्षकों के तबादलों पर हाईकोर्ट सख्त, शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में शिक्षकों और प्रिंसिपलों के तबादलों को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ कहा कि न तो राज्यों में कोई प्रभावी ट्रांसफर पॉलिसी है और न ही तबादलों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। हाईकोर्ट के अनुसार, शैक्षणिक सत्र के बीच सामूहिक तबादले करना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे पूरी शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है।यह टिप्पणी राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अशोक जैन की एकलपीठ ने प्रिंसिपल हरगोविंद मीणा के तबादला आदेश पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए तबादला आदेश पर रोक लगा दी।

शैक्षणिक सत्र के बीच तबादले पर सवाल

हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार को शिक्षा कैलेंडर की पूरी जानकारी होने के बावजूद सितंबर माह में बड़े पैमाने पर प्रिंसिपलों के तबादले करना यह दर्शाता है कि शिक्षा व्यवस्था छात्रों की जरूरतों से ज्यादा प्रशासनिक मनमानी के आधार पर चलाई जा रही है। अदालत के अनुसार, जब सत्र चल रहा हो और पढ़ाई अपने मध्य चरण में हो, तब नेतृत्व परिवर्तन से स्कूलों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह के फैसले छात्रों के हित में नहीं हैं और इससे शिक्षण प्रक्रिया बाधित होती है।

4,527 प्रिंसिपलों के सामूहिक तबादले पर नाराजगी

अदालत ने 22 सितंबर 2025 को किए गए 4,527 प्रिंसिपलों के सामूहिक तबादलों को बेहद गंभीर मामला बताया। कोर्ट के अनुसार, इतने बड़े स्तर पर हुए तबादलों से न केवल शिक्षक प्रभावित हुए, बल्कि हजारों स्कूल और लाखों छात्र भी इससे प्रभावित हुए हैं।हाईकोर्ट ने इस परंपरा को निंदनीय बताते हुए कहा कि सरकार को चाहिए कि शिक्षकों और प्रिंसिपलों के तबादले शैक्षणिक सत्र के बीच न किए जाएं। अदालत ने सुझाव दिया कि तबादले गर्मी की छुट्टियों के दौरान, जब लगभग डेढ़ महीने का समर वैकेशन होता है, उसी समय किए जाने चाहिए ताकि पढ़ाई पर असर न पड़े।

पांच महीने में दूसरी बार तबादला

इस मामले में अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता प्रिंसिपल का पांच महीने के भीतर दूसरी बार तबादला किया गया। कोर्ट ने कहा कि इस पहलू पर राजस्थान सिविल सर्विस अपीलेट ट्रिब्यूनल (रेट) ने गंभीरता से विचार नहीं किया।अदालत के अनुसार, रेट ने इस मामले में मेरिट पर विचार किए बिना एक पूर्वाग्रही और अनुचित दृष्टिकोण अपनाया, जबकि इसी तरह के कई अन्य मामलों में ट्रिब्यूनल ने तबादला आदेशों पर रोक लगाई थी। यह असमान रवैया न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

रेट की कार्यशैली पर भी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने रेट के चेयरमैन और सदस्यों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। न्यायालय ने कहा कि ट्रिब्यूनल से निष्पक्षता और निर्लिप्तता की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि यह सरकारी कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण का पहला और प्रमुख मंच है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इस स्तर पर ही निष्पक्ष सुनवाई नहीं होगी, तो न्याय प्रणाली पर लोगों का भरोसा कमजोर होगा। ऐसे में अदालत आंखें बंद नहीं रख सकती।

कार्मिक विभाग को प्रशिक्षण के निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य के कार्मिक विभाग को निर्देश दिए कि रेट के चेयरमैन और सदस्यों को उचित और नियमित प्रशिक्षण दिया जाए। अदालत ने कहा कि इससे भविष्य में इस तरह की स्थितियों से बचा जा सकेगा और कर्मचारियों को समय पर न्याय मिल सकेगा।

शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा संदेश

राजस्थान हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक तबादला विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक अहम संदेश है। अदालत ने साफ कर दिया है कि शिक्षकों के तबादले प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि छात्रों और शिक्षा हित को ध्यान में रखकर होने चाहिए। यह फैसला आने वाले समय में राज्य की ट्रांसफर पॉलिसी पर असर डाल सकता है।