राजस्थान छात्रसंघ चुनाव: हाईकोर्ट का 'शिक्षा पहले' फरमान, छात्र नेताओं की राजनीतिक उड़ान पर ब्रेक!

राजस्थान हाईकोर्ट ने छात्रसंघ चुनावों पर लगे स्थगन को बरकरार रखते हुए फैसला सुनाया कि छात्रसंघ चुनाव एक लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन शिक्षा का अधिकार इनसे ऊपर है। कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि वह छात्रसंघ चुनावों के लिए स्पष्ट नीति बनाए

Dec 19, 2025 - 12:14
राजस्थान छात्रसंघ चुनाव: हाईकोर्ट का 'शिक्षा पहले' फरमान, छात्र नेताओं की राजनीतिक उड़ान पर ब्रेक!

जयपुर, 19 दिसंबर 2025: राजस्थान में छात्रसंघ चुनावों पर लगे बैन को लेकर हाईकोर्ट ने अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुना दिया है। जस्टिस समीर जैन की बेंच ने साफ-साफ कहा कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार तो है, लेकिन यह शिक्षा के मौलिक अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। इस फैसले से उन हजारों छात्र नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया है, जो कैंपस पॉलिटिक्स को स्टेपिंग स्टोन बनाकर मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखने का सपना देख रहे थे। अब सवाल यह है कि क्या यह फैसला छात्र राजनीति का अंत है या सिर्फ एक अस्थायी विराम?

याचिका और कोर्ट की सुनवाई: शिक्षा vs राजनीति का टकराव

यह मामला तब सुर्खियों में आया जब जय राव समेत कई छात्रों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने दावा किया कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों का मौलिक अधिकार है और सरकार इसे रद्द करके उनके अधिकारों का हनन कर रही है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को लागू करने की प्रक्रिया चल रही है, जिसके कारण चुनाव कराना फिलहाल संभव नहीं। सरकार ने यह भी कहा कि छात्रसंघ चुनाव मौलिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि एक वैकल्पिक व्यवस्था है। 

कोर्ट ने 14 नवंबर को अपना फैसला रिजर्व कर लिया था और आज सुनवाई करते हुए याचिकाओं को निस्तारित कर दिया। जस्टिस जैन ने फैसले में स्पष्ट किया: "छात्रसंघ चुनाव एक संवैधानिक अधिकार हैं, लेकिन वे शिक्षा से ऊपर नहीं हो सकते।" उन्होंने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का भी जिक्र किया, जिसमें सत्र शुरू होने के 8 सप्ताह के भीतर चुनाव कराने की बात कही गई है। लेकिन कोर्ट ने माना कि वह समय सीमा अब निकल चुकी है, इसलिए चुनाव पर स्थगन बरकरार रहेगा।

सरकार को सख्त निर्देश: नीति बनाओ, लेकिन चुनाव मत कराओ!

फैसले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकार छात्रसंघ चुनावों के लिए एक स्पष्ट नीति तैयार करे, लेकिन फिलहाल कोई चुनाव न कराए। इसके अलावा, चुनाव आयोग को भी आदेश दिया गया है कि प्रदेश के कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में लोकसभा या विधानसभा से जुड़े किसी भी चुनावी कार्य को न कराया जाए। कोर्ट का मानना है कि ऐसे कार्य शिक्षा को बाधित करते हैं। 

नवंबर की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजस्थान यूनिवर्सिटी (आरयू) पर तीखी टिप्पणी की थी। जस्टिस ने कहा, "इस समय राजस्थान यूनिवर्सिटी अर्श से फर्श का सफर तय कर रही है। लोकसभा-विधानसभा चुनावों में आरयू अपने भवनों को सरकार को दो महीने के लिए किराए पर देती है। क्या उस समय छात्रों की पढ़ाई बाधित नहीं होती?" कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सत्र का कैलेंडर और समय सारणी ठीक से लागू नहीं हो रही है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

छात्र राजनीति का इतिहास: हंगामा, रोक और पुनरुत्थान

राजस्थान में छात्रसंघ चुनावों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। अंतिम बार ये चुनाव 2022 में हुए थे, जब 29 जुलाई को तत्कालीन सरकार ने चुनाव कराने का फैसला किया था। लेकिन महज दो हफ्ते बाद, 12 अगस्त को कांग्रेस सरकार ने इन्हें रद्द कर दिया। इससे पहले, 2005 में चुनावों के दौरान भारी हंगामा और हुड़दंग हुआ था, जिसके बाद हाईकोर्ट में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) दायर की गई। 2006 में कोर्ट ने चुनावों पर पूरी तरह रोक लगा दी। 

2010 में चुनाव दोबारा शुरू हुए, लेकिन 2020 और 2021 में कोरोना महामारी के कारण इन्हें टाल दिया गया। अब एनईपी के नाम पर फिर से स्थगन ने छात्रों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है। कई छात्र नेता मानते हैं कि कैंपस चुनाव न केवल लोकतंत्र की ट्रेनिंग देते हैं, बल्कि युवाओं को राजनीतिक नेतृत्व के लिए तैयार करते हैं। लेकिन कोर्ट का फैसला साफ है: शिक्षा पहले, राजनीति बाद में।

छात्र नेताओं की निराशा: सपने टूटे, लेकिन उम्मीद बाकी

इस फैसले से छात्र संघों से जुड़े नेताओं को बड़ा झटका लगा है। जयपुर के एक छात्र नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हम दिन-रात कैंपस में सक्रिय रहते हैं, ताकि मुख्यधारा की राजनीति में एंट्री मिले। लेकिन अब सब ठप हो गया।" राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला छात्र राजनीति को कमजोर कर सकता है, लेकिन अगर सरकार जल्द नीति बनाती है, तो भविष्य में चुनाव संभव हो सकते हैं।फिलहाल, राजस्थान के विश्वविद्यालय परिसर शांत हैं, लेकिन छात्रों के मन में सवाल बाकी हैं: क्या शिक्षा और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकतीं? कोर्ट का फैसला इस बहस को नया मोड़ दे सकता है। आगे की अपडेट्स के लिए बने रहें।