धार्मिक कथाओं में शिक्षकों की ड्यूटी पर बवाल, RTE कानून उल्लंघन का आरोप
धार्मिक आयोजनों में शिक्षकों की तैनाती पर सवाल, RTE अधिनियम उल्लंघन और बच्चों के भविष्य पर संकट
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों के दौर में जब पूरी दुनिया शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, उसी समय प्रदेश में शिक्षा से जुड़े एक फैसले ने नई बहस को जन्म दे दिया है। हाल ही में एक आदेश सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को धार्मिक कथाओं के दौरान व्यवस्थाएँ देखने के लिए तैनात किए जाने की बात सामने आई है। इस आदेश के बाद शिक्षा व्यवस्था, बच्चों के भविष्य और कानून के पालन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
वायरल आदेश और बढ़ता विवाद
बताया जा रहा है कि यह आदेश किसी धार्मिक आयोजन के लिए जारी किया गया, जिसमें शिक्षकों को भीड़ प्रबंधन, व्यवस्था संचालन और अन्य गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया गया है। इससे पहले कोटा में कथावाचक धीरेन्द्र शास्त्री द्वारा आयोजित भूत-प्रेत भगाने के कार्यक्रम को लेकर भी काफी चर्चा हुई थी। अब शिक्षकों की ड्यूटी को लेकर जारी यह आदेश चर्चा का केंद्र बन गया है।
RTE अधिनियम की स्पष्ट व्यवस्था
शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 की धारा 27 में साफ़ तौर पर कहा गया है कि शिक्षकों को केवल तीन परिस्थितियों में ही गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जा सकता है—जनगणना, चुनाव और आपदा प्रबंधन। इन तीनों के अलावा किसी अन्य कार्य में शिक्षकों की ड्यूटी लगाना कानूनन गलत माना जाता है। ऐसे में धार्मिक कथाओं की व्यवस्थाओं में अध्यापकों की तैनाती को RTE अधिनियम का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।
बच्चों की पढ़ाई पर असर
शिक्षक किसी भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। जब उन्हें स्कूल से बाहर अन्य कार्यों में लगाया जाता है, तो इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ता है। कक्षाएँ बाधित होती हैं, पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता और बच्चों का शैक्षणिक नुकसान होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले बच्चों के भविष्य के साथ गंभीर खिलवाड़ हैं।
तकनीकी युग और पिछड़ता तंत्र
आज दुनिया के कई देशों में स्कूलों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल लर्निंग और नई शिक्षण पद्धतियों को अपनाया जा रहा है। शिक्षक खुद को नई तकनीकों के अनुसार प्रशिक्षित कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, प्रदेश में शिक्षकों को धार्मिक आयोजनों की व्यवस्थाओं में लगाया जाना शिक्षा तंत्र की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है।
जवाबदेही किसकी?
इस पूरे मामले में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर इस आदेश के लिए जिम्मेदार कौन है।
क्या यह आदेश उच्च स्तर के निर्देशों पर जारी किया गया?
या फिर स्थानीय अधिकारियों ने अपने विवेक से इसे लागू कर दिया?
यदि यह आदेश कानून के खिलाफ है, तो क्या इसे जारी करने वाले अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होगी ?
इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं।
शिक्षा मंत्री की भूमिका पर सवाल
मामले को लेकर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की जवाबदेही को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले शिक्षकों की ड्यूटी यदि गैर-कानूनी रूप से लगाई जा रही है, तो इस पर विभागीय स्तर पर स्पष्टीकरण और कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है। विपक्षी संगठनों और शिक्षक संघों का कहना है कि शिक्षा मंत्री को इस पूरे प्रकरण पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।