संसद में श्रमिक अधिकारों की आवाज़: सांसद हनुमान बेनीवाल ने 80% स्थानीय रोजगार की उठाई मांग
लोकसभा में सांसद हनुमान बेनीवाल ने औद्योगिक विधेयक का विरोध करते हुए श्रमिक अधिकार और स्थानीय रोजगार की मांग उठाई
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने गुरुवार को लोकसभा में औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान मजदूरों और बेरोजगारों के हितों को मजबूती से उठाया। उन्होंने इस विधेयक को श्रमिक अधिकारों को कमजोर करने वाला बताते हुए सरकार से इसे पुनर्विचार के लिए भेजने की मांग की।
सांसद बेनीवाल ने कहा कि सरकार इस विधेयक को “तकनीकी संशोधन” और “स्पष्टता” के नाम पर ला रही है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव मजदूरों की असुरक्षा बढ़ाने वाला है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यह कानून श्रमिक हितैषी होता, तो देशभर की ट्रेड यूनियनें इसका विरोध क्यों करतीं। बेनीवाल ने कर्मचारी, कारखाना कर्मी, संविदा श्रमिक और गिग वर्कर्स की समस्याओं को सदन के सामने रखा।
विधेयक का विरोध करते हुए सांसद ने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(सी) और 21 की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि समानता का अधिकार, ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार और हड़ताल का अधिकार मजदूरों के मूल अधिकार हैं। यदि इन पर कठोर शर्तें और दंड लगाए जाते हैं, तो ये अधिकार व्यवहार में समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार नौकरी की सुरक्षा से जुड़ा है।
सांसद बेनीवाल ने राजस्थान के श्रम विभाग में भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कहा कि सीमेंट फैक्ट्रियों और रिफाइनरी क्षेत्रों में मजदूरों के साथ अन्याय के कई मामले सामने आते रहते हैं। कई बार मजदूरों की मृत्यु के बाद भी परिजनों को न्याय नहीं मिलता और आंदोलन के बाद ही उद्योग प्रबंधन झुकता है। उन्होंने कहा कि योजनाएं बनी हैं, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन कमजोर है।
बेनीवाल ने स्पष्ट किया कि वे उद्योग, निवेश या सुधार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन श्रमिक विरोधी कानून स्वीकार नहीं किए जा सकते। उन्होंने मांग की कि ट्रेड यूनियनों और राज्य सरकारों से व्यापक परामर्श के बाद ही कानून लागू हो। साथ ही औद्योगिक न्यायाधिकरणों की समयबद्ध स्थापना की जरूरत बताई।
सांसद ने सीमेंट और रिफाइनरी जैसे उद्योगों में 80 प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को देने की नीति बनाने की मांग की। इसके साथ ही नागौर में लंबित ईएसआईसी डिस्पेंसरी प्रस्ताव को जल्द मंजूरी देने और संविदा कर्मियों को नियमित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की।