अरावली की 'प्राकृतिक दीवार' पर संकट: भाटी ने पीएम को लिखा पत्र, गहलोत भी मुहिम में शामिल; 90% पहाड़ियां खतरे में!

राजस्थान की अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर बड़ा अभियान चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मुहिम का समर्थन किया है, जबकि निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की 100 मीटर ऊंचाई वाली व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की है।

Dec 18, 2025 - 19:19
अरावली की 'प्राकृतिक दीवार' पर संकट: भाटी ने पीएम को लिखा पत्र, गहलोत भी मुहिम में शामिल; 90% पहाड़ियां खतरे में!

बाड़मेर 18 दिसंबर 2025: राजस्थान की जीवन रेखा मानी जाने वाली अरावली पर्वतमाला पर मंडरा रहे संकट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस प्राचीन पर्वतमाला के संरक्षण के लिए चल रहे अभियान का खुला समर्थन किया है, जबकि निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इस मुद्दे को और गंभीरता से उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। भाटी का कहना है कि हालिया प्रशासनिक आदेश से पूरी अरावली ही खत्म हो सकती है, जो खनन माफियाओं के लिए 'रेड कार्पेट' जैसा साबित होगा। क्या यह पर्यावरणीय आपदा का अलार्म है? आइए विस्तार से जानते हैं इस मुहिम की पूरी कहानी।

अरावली संरक्षण अभियान में बड़े नामों की एंट्री

अरावली पर्वतमाला, जो उत्तर-पश्चिम भारत को थार मरुस्थल के विस्तार से बचाने वाली प्राकृतिक दीवार है, इन दिनों विवादों के घेरे में है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस अभियान का समर्थन करते हुए कहा कि अरावली का संरक्षण राजस्थान की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। गहलोत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी भी इस मुहिम से जुड़ गए हैं। शिव विधायक भाटी, जो अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं, ने सुप्रीम कोर्ट की हालिया व्याख्या पर सवाल उठाते हुए पीएम मोदी को पत्र लिखा।  

भाटी ने पत्र में लिखा, "यह मामला केवल किसी कानूनी परिभाषा का नहीं, बल्कि राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली सहित समूचे उत्तर भारत के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।" उन्होंने जोर देकर कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली की श्रेणी से बाहर करने का आदेश पूरी पर्वतमाला को नष्ट कर देगा। "यह आदेश खनन माफियाओं के लिए रेड कार्पेट बिछाने जैसा है," भाटी ने तीखी टिप्पणी की।

100 मीटर ऊंचाई वाला 'खतरनाक' आदेश: क्या होगा असर

विधायक भाटी ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या का हवाला देते हुए चिंता जताई कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को 'पहाड़' न मानने की नीति से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो जाएगा। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़ों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि राजस्थान में अरावली क्षेत्र की 12,081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1,048 ही 100 मीटर से अधिक ऊंचाई की हैं। इसका मतलब है कि नई व्याख्या लागू होने पर लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां कानूनी सुरक्षा से वंचित हो जाएंगी।  

"इससे खनन, रियल एस्टेट और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल जाएगा," भाटी ने चेताया। उन्होंने कहा कि इस आदेश पर पुनर्विचार जरूरी है, वरना पूरा इकोसिस्टम तबाह हो जाएगा। मरुस्थल का विस्तार बढ़ेगा, क्लाइमेट चेंज का खतरा मंडराएगा और पश्चिमी राजस्थान में स्थायी जल संकट आ सकता है। भाटी ने दावा किया, "यदि अरावली पर्वतमाला नहीं होती, तो आज पूरा राजस्थान मरूस्थलीय होता।"

अरावली: प्राचीन पर्वतमाला की पारिस्थितिक भूमिका

692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जिसका 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है और यह 15 जिलों से गुजरती है। भाटी ने पत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया: "यह पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत को मरुस्थलीकरण से बचाने वाली प्राकृतिक दीवार है।" अरावली की चट्टानी संरचना वर्षा जल को रोककर भूमि में समाहित करती है, जिससे प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष लगभग 20 लाख लीटर भूजल का पुनर्भरण होता है।  

इसके अलावा, यह मानसूनी हवाओं को रोकने, लू की तीव्रता कम करने और तापमान संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। भाटी ने कहा कि अरावली के कमजोर होने से जल संकट स्थायी रूप ले लेगा। दिलचस्प बात यह है कि भाटी ने दावा किया कि दिल्ली में राष्ट्रपति भवन और संसद भवन भी अरावली पर्वतमाला पर ही बने हुए हैं, जो इसकी व्यापकता को दर्शाता है।

सरकार की दोहरी नीति पर सवाल

विधायक भाटी ने राज्य सरकार की नीतियों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बजट 2025-26 में सरकार ने अरावली पर्वतमाला के विकास की बात की थी और इसके लिए करीब ढाई सौ करोड़ रुपये का बजट जारी करने का ऐलान किया। "ऐसे में यह समझ से परे है कि एक तरफ सरकार अरावली को विकसित करना चाहती है और दूसरी तरफ इसे खत्म करने वाले निर्णयों पर चुप्पी साधे हुए है," भाटी ने तंज कसा। उन्होंने अपील की कि राजस्थान सरकार की जिम्मेदारी है कि जनता की आवाज को आगे पहुंचाए और कोर्ट में तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करे। "जो भी व्यक्ति अरावली बचाने की मुहिम से जुड़ा है, हम उसके साथ हैं," भाटी ने कहा।